पुष्पगिरि तीर्थ में आज से तीन दिवसीय चातुर्मास कलश स्थापना महोत्सव का शुभारंभ, गुरु चरण–यंत्र–अखंड दीप स्थापना से गूंजेगा तीर्थ
अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज के सान्निध्य में होंगे दिव्य धार्मिक अनुष्ठान, आठ दिवसीय निर्जल तपस्या बनी श्रद्धा का केंद्र
पुष्पगिरि तीर्थ (सोनकच्छ)।
गणाचार्य आचार्य श्री 108 पुष्पदंत सागरजी महाराज की पावन परंपरा एवं अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज ससंघ के दिव्य सान्निध्य में पुष्पगिरि तीर्थ पर आज 28 जुलाई से तीन दिवसीय गुरु चरण, यंत्र, अखंड दीप संकल्प एवं चातुर्मास कलश स्थापना महोत्सव का भव्य शुभारंभ हो रहा है। 28 से 30 जुलाई तक चलने वाले इस आध्यात्मिक महोत्सव में गुरु भक्ति, विशेष पूजन-विधान, तप-साधना और अनेक धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से चातुर्मास की विधिवत शुरुआत होगी।
प्रवक्ता रोमिल जैन ने बताया कि महोत्सव के प्रथम दिन भगवान मुनिसुव्रतनाथ जिनालय में प्रातः 4:30 बजे दिव्य मंगल पाठ, दीप पूजा, जिनाभिषेक एवं शांतिधारा का आयोजन होगा। इसके पश्चात प्रातः 10:50 बजे नागपुर के अनिल–मीणा जैन परिवार द्वारा ध्वजारोहण किया जाएगा। दोपहर में आचार्य संघ सामायिक, मौन एवं चिंतन-मनन में लीन रहेगा। दोपहर 2:30 बजे मंचासीन गुरु की पूजा एवं चातुर्मासिक बड़ा प्रतिक्रमण संपन्न होगा। सायं 5 बजे वर्षायोग गुरु भक्ति पथ, दिग्बंधन विधि, गुरु चरण, यंत्र एवं अखंड दीप स्थापना का भव्य आयोजन होगा, जिसके पश्चात आरती एवं मंगलभावना के साथ दिन का समापन होगा।
29 जुलाई को प्रातः 8:30 बजे गुरु पूर्णिमा महोत्सव श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाया जाएगा, जबकि 30 जुलाई को इसी समय वीर शासन जयंती के अवसर पर विशेष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
आठ दिवसीय निर्जल तपस्या में लीन हैं अंतर्मना आचार्य
अष्टाहिका महापर्व के पावन अवसर पर अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज आठ दिनों की कठोर निर्जल उपवास साधना में लीन हैं। संभावना है कि पूर्णिमा अथवा एकम के दिन उनका पारणा संपन्न होगा। जैन परंपरा में अष्टाहिका पर्व के दौरान सिद्धचक्र मंडल विधान, नंदीश्वर द्वीप मंडल विधान, उपवास और बड़े प्रतिक्रमण का विशेष महत्व माना जाता है।
आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज दिगंबर जैन परंपरा के अग्रणी तपस्वियों में गिने जाते हैं। उन्होंने अपने जीवन में 557 दिनों की मौन साधना तथा 4,000 से अधिक व्रत एवं उपवास कर अद्वितीय तप का उदाहरण प्रस्तुत किया है। इसी विलक्षण साधना के कारण उन्हें ‘साधना महोदधि’ एवं ‘अंतर्मना’ जैसी सम्मानजनक उपाधियों से अलंकृत किया गया है।
“रिश्ते शब्दों से बनते भी हैं और बिगड़ते भी” — आचार्य प्रसन्न सागरजी
धर्मसभा को संबोधित करते हुए अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि आज मनुष्य शब्दों के अर्थ बदलने में तो दक्ष हो गया है, लेकिन शब्दों का संयमित उपयोग करने की कला भूलता जा रहा है। उन्होंने कहा कि “मुंह में जुबान तो सभी रखते हैं, लेकिन कमाल वही करते हैं जो उसका संयमपूर्वक उपयोग करते हैं। रिश्ते गलती से नहीं, बल्कि एक गलतफहमी और कटु शब्दों से टूटते हैं।”
उन्होंने सभी से आग्रह किया कि संबंधों को मधुर बनाए रखने के लिए कटाक्ष, अपमान, ईर्ष्या, द्वेष और असत्य से भरे शब्दों का त्याग करें तथा प्रेम, संवेदना और मर्यादा से युक्त वाणी का प्रयोग करें। उन्होंने कहा कि “दिल से अधिक नाज़ुक कोई चीज नहीं होती, और शब्दों का वार भी खंजर की तरह चुभता है।”
प्रचार-प्रसार: नरेंद्र अजमेरा, पीयूष कासलीवाल (औरंगाबाद)
समाचार संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी।
