“सप्ताह के सात दिन नहीं, जीवन को सफल बनाने वाले सात दिव्य संकल्प हैं” — आचार्य विहर्ष सागर
जैन भवन की धर्मसभा में परिवार, संस्कार और आत्मकल्याण का दिया अमृत संदेश; बोले— जहां सम्मान और मधुर वाणी होती है, वहीं बसता है सुखी परिवार
मदनगंज-किशनगढ़।
सप्ताह के सात दिन केवल कैलेंडर के पन्ने नहीं, बल्कि जीवन को ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले सात दिव्य संकल्प हैं। यदि मनुष्य इन सात सूत्रों को अपने जीवन का हिस्सा बना ले, तो परिवार में प्रेम, समाज में सद्भाव और आत्मा में शांति का प्रकाश स्वतः फैल जाता है। यह प्रेरणादायी उद्बोधन आचार्य श्री 108 विहर्षसागर महाराज ने जैन भवन में आयोजित विशाल धर्मसभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए दिया।
आचार्यश्री ने सप्ताह के प्रत्येक दिन को जीवन के एक श्रेष्ठ संस्कार से जोड़ते हुए कहा कि रविवार विश्वास का दिन है। भगवान, गुरु, परिवार और स्वयं पर अटूट विश्वास ही जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है। सोमवार सौम्यता का प्रतीक है। जहां व्यवहार में विनम्रता, प्रेम और वात्सल्य होता है, वहां कलह नहीं, केवल सुख और शांति का वास होता है।
उन्होंने कहा कि मंगलवार मंगलाचार का संदेश देता है। प्रत्येक परिवार को प्रतिदिन रात्रि विश्राम से पूर्व सामूहिक रूप से णमोकार महामंत्र एवं भक्तामर स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। इससे घर में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है और परिवार संस्कारों से जुड़ा रहता है।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि बुधवार सद्बुद्धि, गुरुवार गुरु-कृपा और शुक्रवार सुख व आशीर्वाद का प्रतीक है। जब मनुष्य के जीवन में विश्वास, सौम्यता, मंगलाचार, सद्बुद्धि और गुरु का आशीर्वाद एक साथ मिल जाते हैं, तब शनिवार के संकट भी उसके आत्मबल को डिगा नहीं सकते।
उन्होंने वर्तमान समाज की सबसे बड़ी समस्या बताते हुए कहा कि आज सम्मान की भावना कमजोर पड़ती जा रही है। रिश्तों में प्रेम कम नहीं हुआ, लेकिन अहंकार बढ़ गया है। यदि परिवार का प्रत्येक सदस्य एक-दूसरे का सम्मान करे और मधुर वाणी बोले, तो हर घर मंदिर बन सकता है। “परिवार में सुख, प्रेम और एकता का मूल मंत्र है— एक-दूसरे का सम्मान।”
धर्मसभा में मुनि श्री 108 विजयेशसागर महाराज ने जिनवाणी की महिमा बताते हुए कहा कि जिनवाणी आत्मा का अमृत है। जिस प्रकार शरीर जल के बिना जीवित नहीं रह सकता, उसी प्रकार आत्मा जिनवाणी के बिना जागृत नहीं हो सकती। उन्होंने कहा, “जैसे पोलियो की दो बूंदें जीवन बचाती हैं, वैसे ही जिनवाणी की दो बूंदें कानों में पड़ जाएं तो आत्मकल्याण का मार्ग खुल जाता है।”
उन्होंने अभिभावकों का आह्वान करते हुए कहा कि बच्चों को बचपन से ही मंदिर, अभिषेक, आहारदान और गुरु सान्निध्य से जोड़ना चाहिए। सप्ताह में कम से कम एक दिन उन्हें गुरु के पास अवश्य ले जाएं, क्योंकि संस्कारों से जुड़ी पीढ़ी ही समाज और धर्म का उज्ज्वल भविष्य बनाती है।
धर्मसभा श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक चेतना से सराबोर रही। श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री के ‘सप्त जीवन सूत्रों’ को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया और धर्मसभा आत्मचिंतन, संस्कार एवं पारिवारिक मूल्यों का प्रेरणादायी संगम बन गई।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी।9929747312

