ऐतिहासिक मंगल प्रवेश: एक माह के विहार के बाद जिनशासन तीर्थ पहुंचे मुनिद्वय निष्पक्षसागर–निस्पृहसागर महाराज, 54 फीट ऊंचे शांतिनाथ प्रभु की साक्षी में होगा चातुर्मास

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ऐतिहासिक मंगल प्रवेश: एक माह के विहार के बाद जिनशासन तीर्थ पहुंचे मुनिद्वय निष्पक्षसागर–निस्पृहसागर महाराज, 54 फीट ऊंचे शांतिनाथ प्रभु की साक्षी में होगा चातुर्मास

9 अगस्त को चातुर्मास कलश स्थापना महोत्सव | मुनिश्री का संदेश— “मुनि चलता-फिरता तीर्थ हैं, पद नहीं मंदिर का सेवक बनने का भाव रखें”

अजमेर।

धर्म, तप और त्याग की अनुपम साधना का साक्षात स्वरूप उस समय देखने को मिला, जब आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के परम शिष्य पूज्य मुनिश्री 108 निष्पक्षसागर जी महाराज एवं मुनिश्री 108 निस्पृहसागर जी महाराज लगभग एक माह के मंगल विहार के उपरांत रविवार सायंकाल भव्य शोभायात्रा के साथ जिनशासन तीर्थ क्षेत्र पहुंचे। मुनिद्वय के मंगल प्रवेश ने पूरे तीर्थ क्षेत्र को धर्ममय बना दिया। श्रद्धा और भक्ति का ऐसा अद्भुत वातावरण बना कि हर ओर गुरु भक्ति, जयघोष और मंगलध्वनि ही सुनाई दे रही थी।

 

राजस्थान के रामगंजमंडी से विहार करते हुए पहुंचे मुनिसंघ की अगवानी के लिए सैकड़ों श्रद्धालु मार्ग में ही पलक-पांवड़े बिछाए खड़े थे। बैंड-बाजों, ढोल-नगाड़ों, पुष्पवर्षा और जयघोषों के बीच निकली भव्य शोभायात्रा ने पूरे क्षेत्र को आध्यात्मिक उत्सव में परिवर्तित कर दिया। श्रद्धालुओं ने गुरुचरणों में विनय अर्पित कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया और जिनशासन तीर्थ का वातावरण भक्तिरस से सराबोर हो उठा।

“मुनि स्वयं चलता-फिरता तीर्थ हैं”

मंगल प्रवेश के उपरांत आयोजित धर्मसभा में मुनिश्री 108 निष्पक्षसागर जी महाराज ने कहा कि “मुनि स्वयं चलता-फिरता तीर्थ होते हैं। जहां मुनिराज के चरण पड़ते हैं, वहां धर्म, संयम और आत्मजागरण का वातावरण निर्मित हो जाता है।”

 

उन्होंने कहा कि आज समाज में पद और प्रतिष्ठा की होड़ बढ़ रही है, जबकि वास्तविक सौभाग्य मंदिर का सेवक बनने में है। मंदिर का सेवक बनने वाला व्यक्ति अहंकार से मुक्त होकर सेवा, विनम्रता और समर्पण का जीवन जीता है। यही भाव आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।

 

9 अगस्त को होगा चातुर्मास कलश स्थापना महोत्सव

 

जिनशासन तीर्थ में मुनिद्वय के पावन सान्निध्य में 9 अगस्त को चातुर्मास कलश स्थापना महोत्सव अत्यंत श्रद्धा और भव्यता के साथ आयोजित होगा। इस ऐतिहासिक अवसर पर राजस्थान सहित देश के विभिन्न राज्यों से हजारों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है।

 

चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन धर्मसभा, प्रवचन, स्वाध्याय, पूजन, आराधना, तप, संस्कार एवं अनेक धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होंगे। चार माह तक जिनशासन तीर्थ धर्म, साधना और आध्यात्मिक जागरण का जीवंत केंद्र बना रहेगा।

 

जिनशासन तीर्थ: आस्था, स्थापत्य और आध्यात्मिक वैभव का अद्भुत संगम

 

अजमेर का जिनशासन तीर्थ अपनी भव्यता और आध्यात्मिक गरिमा के कारण देशभर में विशेष पहचान रखता है। यहां भगवान शांतिनाथ की 54 फीट ऊंची विराट प्रतिमा श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण और आस्था का प्रमुख केंद्र है। इसके साथ ही 24 तीर्थंकरों की सवा 11 फीट ऊंची पद्मासन प्रतिमाएं एक ही परिसर में स्थापित हैं, जो इस तीर्थ को देश के चुनिंदा विशिष्ट जैन तीर्थों में स्थान दिलाती हैं।

 

वर्ष 2014 में आचार्य श्री 108 वसुनंदी महाराज की प्रेरणा से इस महायोजना का शुभारंभ हुआ था। लगभग 11 वर्षों के अथक परिश्रम, समाज के समर्पण और शिल्पकारों की साधना के बाद यह भव्य तीर्थ साकार हुआ।

 

भगवान शांतिनाथ की प्रतिमा के निर्माण के लिए भीलवाड़ा जिले के बिजोलिया से लगभग 400 टन वजनी विशाल पाषाण लाया गया, जिसे तराशकर लगभग 250 टन वजनी और 54 फीट ऊंची दिव्य प्रतिमा का निर्माण किया गया। यह प्रतिमा आज जैन संस्कृति, शिल्पकला और आध्यात्मिक वैभव की अनुपम पहचान बन चुकी है।

 

चातुर्मास से बढ़ेगी तीर्थ की आध्यात्मिक गरिमा

 

मुनिश्री निष्पक्षसागर जी महाराज एवं मुनिश्री निस्पृहसागर जी महाराज का यह चातुर्मास जिनशासन तीर्थ के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जा रहा है। श्रद्धालुओं का मानना है कि आगामी चार माह धर्म, साधना, स्वाध्याय और आत्मचिंतन की ऐसी गंगा प्रवाहित होगी, जिससे न केवल अजमेर बल्कि सम्पूर्ण राजस्थान का धार्मिक वातावरण नई ऊर्जा से ओतप्रोत होगा।

 

रिपोर्ट : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 

मो. 9929747312

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