भाग–4  25 जुलाई 2018 एक ऐसा दिन जिसे रामगंजमंडी कभी नहीं भूल सकता चार महीनों का वह स्वर्णिम अध्याय

विनीत साग़र जी महाराज

भाग–4  25 जुलाई 2018 एक ऐसा दिन जिसे रामगंजमंडी कभी नहीं भूल सकता चार महीनों का वह स्वर्णिम अध्याय

25 जुलाई 2018 को ऐतिहासिक प्रवेश के अगले दिन, 26 जुलाई 2018, आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी को रामगंज मंडी में ऐतिहासिक चातुर्मास स्थापना सम्पन्न हुई।

 

 

आज के समय में जहाँ चातुर्मास का अर्थ प्रायः भव्य आयोजन, कलश स्थापना, बोलियाँ और विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों से जोड़ा जाने लगा है, वहीं यह चातुर्मास उन सबसे सर्वथा भिन्न था।

न कोई कलश स्थापना।

न कोई बोली।

न कोई प्रदर्शन।

केवल धर्म, स्वाध्याय और साधना।

यही पूज्य मुनिश्री विनीत सागर जी महाराज एवं पूज्य मुनिश्री चंद्रप्रभ सागर जी महाराज की परंपरा थी। वे न शिविर लगवाते थे, न समागमों की भीड़ चाहते थे। उनका सम्पूर्ण आग्रह केवल एक बात पर रहता था—स्वाध्याय।और स्वाध्याय ऐसा, जिसमें किसी प्रकार का आर्थिक व्यय भी न हो।

अगले ही दिन गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व आया। उस शुभ अवसर पर सोलापुर के श्रेष्ठी श्रद्धेय शांतिनाथ जी ने पूज्य मुनिश्री के श्रीचरणों में प्रतिमा व्रत ग्रहण किए। उसी दिन पूज्य मुनिश्री चंद्रप्रभ सागर जी महाराज के प्रथम पारणे का सौभाग्य पुनः हमारे परिवार को प्राप्त हुआ।
इसी के साथ उस ऐतिहासिक चातुर्मास का वास्तविक शुभारम्भ हुआ।

इन चार महीनों में न कोई संगोष्ठी हुई, न कोई विशाल सम्मेलन, न कोई प्रचारात्मक आयोजन और न ही किसी प्रकार का आडंबर।

फिर भी यदि किसी ने उस चातुर्मास को निकट से देखा है, तो वह जानता है कि वास्तविक धर्मप्रभावना कैसी होती है। युवा
वर्ग नियम और संयम की ओर आकर्षित हो रहा था।

नए-नए त्याग लिए जा रहे थे।

लोगों की रुचि स्वाध्याय में बढ़ रही थी।

धर्म केवल सुनने की वस्तु नहीं रहा था, बल्कि जीवन में उतरने लगा था।

प्रतिदिन प्रातः पूज्य मुनिश्री विनीत सागर जी महाराज द्वारा आचार्य समन्तभद्र स्वामी रचित रत्नकरण्डक श्रावकाचार का अत्यंत सरल एवं व्यावहारिक स्वाध्याय कराया जाता था।

दोपहर में पूज्य मुनिश्री चंद्रप्रभ सागर जी महाराज द्वारा अष्टपाहुड़ का गंभीर एवं तत्त्वपूर्ण अध्ययन कराया जाता था।

इसके अतिरिक्त पूज्य मुनिश्री विनीत सागर जी महाराज द्वारा संत भवन में दर्जनों आगम एवं अन्य ग्रंथों का नियमित स्वाध्याय भी कराया गया।

ऐसा वातावरण बन गया था कि समय कब बीत जाता, इसका आभास ही नहीं होता था।

रक्षा बंधन का अविस्मरणीय प्रसंग

इसी चातुर्मास के दौरान रक्षा बंधन का पावन पर्व भी आया।उस वर्ष सागर जेल के बंदियों द्वारा हथकरघे से एक विशाल राखी तैयार की गई थी। उसे पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के संघ के जहाँ-जहाँ भी साधु-संत विराजमान थे, वहाँ विमोचन हेतु भेजा गया।

रामगंजमंडी में उस ऐतिहासिक राखी के विमोचन का सौभाग्य हमारे बाबरिया परिवार को प्राप्त हुआ।

वह राखी आज भी हमारे घर में सुरक्षित है और उस अविस्मरणीय चातुर्मास की मधुर स्मृतियों को जीवंत बनाए हुए है।देखते ही देखते चार महीने कब बीत गए, इसका आभास ही नहीं हुआ।

11 नवम्बर 2018 — एक और ऐतिहासिक घटना

निष्ठापन के उपरान्त 11 नवम्बर 2018 को एक और अत्यंत प्रेरणादायक प्रसंग घटित हुआ।

आज के समय में जहाँ छोटे-से-छोटे धार्मिक कार्यक्रमों के लिए भी व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाता है, वहीं उस दिन पूज्य मुनिश्री ने आहारचर्या से पूर्व शुद्धि के पश्चात सहज भाव से कहा—

“सूचना दे दो, आहार के बाद पिच्छी परिवर्तन होगा। जिन्होंने नियम-संयम लिए हैं, वे सभी पिच्छी के लिए आ जाएँ।”

बस इतनी-सी सूचना।

न कोई विशेष निमंत्रण, न कोई औपचारिकता।

और फिर…

11 तारीख, 11वाँ महीना और ठीक 11 बजे पिच्छी परिवर्तन प्रारम्भ हुआ।

आश्चर्य की बात यह थी कि अत्यंत अल्प समय में ही पूरा जिनालय श्रद्धालुओं से खचाखच भर गया।

किसी प्रकार की अनावश्यक औपचारिकता के बिना मात्र 11 मिनट में सम्पूर्ण पिच्छी परिवर्तन सम्पन्न हो गया।

पूज्य मुनिश्री विनीत सागर जी महाराज की पुरानी पिच्छिका प्राप्त करने का सौभाग्य ब्रह्मचारिणी रीना दीदी को प्राप्त हुआ।

वहीं पूज्य मुनिश्री चंद्रप्रभ सागर जी महाराज की पिच्छिका प्राप्त करने का सौभाग्य मेरे माता-पिता—श्रीमती रेखा देवी एवं श्री सुरेश कुमार बाबरिया—को प्राप्त हुआ।

सिद्धचक्र विधान और कीर्ति स्तम्भ

इसके पश्चात अष्टान्हिका पर्व के पूर्व सिद्धि की आराधना हेतु सिद्धचक्र महामण्डल विधान सम्पन्न हुआ, जिसमें मुनिद्वय का सान्निध्य प्राप्त हुआ।

फिर 25 नवम्बर 2018 को पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के 56वें आचार्य पदारोहण दिवस के अवसर पर रामगंज मंडी नसियांजी में मुनिद्वय के सान्निध्य में संयम कीर्ति स्तम्भ का लोकार्पण सम्पन्न हुआ।

उस पुण्य कार्य का सौभाग्य भी हमारे परिवार को प्राप्त हुआ।

उसी दिन, ठीक चार महीने पूर्ण होने पर, मुनिद्वय ने रामगंज मंडी से पुनः विहार किया।

इसके पश्चात उन्होंने संधारा, भानपुरा, झालरापाटन, रटलाई, पिड़ावा, मिश्रौली, भवानीमंडी सहित अनेक क्षेत्रों में धर्मप्रभावना करते हुए हजारों श्रद्धालुओं को धर्ममार्ग से जोड़ा।

बाद में 19 जून 2019 को पुनः रामगंज मंडी पधारे, दो-तीन दिन का प्रवास किया और वहाँ से कोटा की ओर विहार कर वर्ष 2019 के चातुर्मास हेतु प्रस्थान किया।

एक व्यक्तिगत अनुभूति

आज जब पीछे मुड़कर उन दिनों को देखता हूँ, तो लगता है कि हमने केवल एक चातुर्मास नहीं देखा था।

हमने देखा था—

गुरु पर अटूट विश्वास कैसा होता है।

नियम और संयम का वास्तविक स्वरूप क्या होता है।

स्वाध्याय किस प्रकार समाज का रूप बदल सकता है।

और यह भी कि बिना किसी आडंबर, बिना किसी प्रदर्शन और बिना किसी आर्थिक दिखावे के भी धर्मप्रभावना अपने सर्वोच्च शिखर पर पहुँच सकती है।

वह चातुर्मास केवल रामगंज मंडी का गौरव नहीं था।

वह इस बात का सजीव प्रमाण था कि जहाँ गुरु-कृपा, श्रद्धा और विशुद्ध भावना एक साथ मिल जाती है, वहाँ असंभव दिखाई देने वाले कार्य भी सहज ही संभव हो जाते हैं।

25 जुलाई 2018 केवल एक तिथि नहीं है।वह रामगंज मंडी के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है—जिसे जिसने जिया, वह आज भी उसे स्मरण कर भावविभोर हो उठता है।

आज पूज्य मुनिश्री विनीत सागर जी महाराज एवं मुनिश्री चंद्रप्रभ सागर जी महाराज, पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के पावन संघ में सुशोभित होकर विद्योदय धाम, भोपाल में विराजमान हैं। उनकी सतत धर्मप्रभावना, स्वाध्याय और संयममयी साधना अनगिनत श्रद्धालुओं के जीवन को आज भी आलोकित कर रही है। रामगंज मंडी का वह ऐतिहासिक चातुर्मास केवल एक मधुर स्मृति नहीं, बल्कि गुरु-कृपा, विशुद्ध भावना और धर्मनिष्ठ जीवन की प्रेरणा बनकर आज भी हृदय में जीवंत है।

सिद्धार्थ जैन बाबरिया रामगंजमंडी आलेख

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