भाग–2 25 जुलाई 2018 एक ऐसा दिन जिसे रामगंजमंडी कभी नहीं भूल सकती गुरु-कृपा के संकेत और रामगंज मंडी की ओर बढ़ते चरण
रात्रि विश्राम तो हो गया, परंतु आँखों में नींद कहाँ थी? मन में बस एक ही उत्सुकता थी—प्रातः कब होगी और कब पूज्य मुनिद्वय के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होगा।
प्रातः लगभग चार बजे हम सभी उठकर तैयार हो गए। लगभग पाँच बजे मुनिसंघ के विश्राम स्थल पर पहुँच गए। उस समय पूज्य मुनिश्री विनीत सागर जी महाराज एवं पूज्य मुनिश्री चंद्रप्रभ सागर जी महाराज अपने कक्ष में सामायिक, प्रतिक्रमण एवं अन्य आवश्यक क्रियाओं में संलग्न थे। कक्ष का द्वार बंद था, इसलिए हम बाहर ही शांत भाव से बैठकर प्रतीक्षा करने लगे।
कुछ ही मिनटों बाद कक्ष का द्वार खुला।
जैसे ही दोनों पूज्य मुनिराज की दृष्टि हम पर पड़ी, उनके मुखमंडल पर एक संतोष भरी सहज मुस्कान दिखाई दी। ऐसा प्रतीत हुआ मानो वे मन ही मन कह रहे हों—”ऐन समय पर विहार करने का निर्णय उचित ही रहा।”
हम सभी ने श्रद्धापूर्वक श्रीफल अर्पित किया और रामगंजमंडी में चातुर्मास हेतु विनम्र निवेदन किया। दोनों पूज्य मुनिराज ने मुस्कुराकर आशीर्वाद प्रदान किया। शब्द कम थे, किंतु उस मौन आशीर्वाद में अपार विश्वास छिपा हुआ था।
लगभग पाँच मिनट बाद विहार प्रारंभ हो गया। उस दिन आहारचर्या बस्सी स्थित भैरव पैलेस में सम्पन्न हुई। आहार के पश्चात पूज्य मुनिश्री चंद्रप्रभ सागर जी महाराज ने हम चारों की ओर मुस्कुराते हुए देखा और सहज भाव से पूछा—
“चार जने करा लोगे क्या चातुर्मास?”
क्षणभर का मौन छाया, फिर अभिषेक लुहाड़िया ने तुरंत उत्तर दिया—
“जब भागीरथ अकेले गंगा ला सकते हैं, तो हम तो फिर भी चार हैं।”
यह उत्तर सुनकर वातावरण में हल्की मुस्कान फैल गई। आगे भी इसी प्रकार आत्मीय चर्चा चलती रही। वहाँ बोराव, सिंगोली तथा आसपास के अनेक क्षेत्रों से आए श्रद्धालु भी उपस्थित थे।सामायिक के पश्चात पुनः विहार प्रारंभ हुआ और उस दिन का रात्रि विश्राम पारसोली में हुआ।इसी बीच रामगंज मंडी से श्रद्धालुओं का एक और समूह भी वहाँ पहुँच चुका था। अब तक सभी के मन में आशा और विश्वास दोनों साथ-साथ चल रहे थे।
अगले दिन प्रातः पुनः विहार प्रारंभ हुआ। आहारचर्या काटून्दा मोड़ पर सम्पन्न हुई।आहार के पश्चात जैसे ही विहार का समय आया, रामगंजमंडी समाज के सैकड़ों श्रद्धालु सड़क पर उत्सुकता से खड़े हो गए। दूसरी ओर बिजौलिया के श्रद्धालु भी पूरी तैयारी के साथ प्रतीक्षा कर रहे थे।सभी की निगाहें केवल एक दिशा में थीं।लेकिन मुनिसंघ ने अपने चरण सिंगोली की ओर बढ़ा दिए।
बस, उसी क्षण यह लगभग स्पष्ट हो गया कि बिजौलिया और कोटा की दिशा अब पीछे छूट चुकी है। आगे का मार्ग केवल सिंगोली, रावतभाटा और रामगंजमंडी की ओर ही जाता था।यही वह क्षण था जब रामगंज मंडी की आशाएँ पहले से कहीं अधिक प्रबल हो गईं।उस दिन का रात्रि विश्राम धारड़ी में हुआ और अगले दिन आहारचर्या सिंगोली में सम्पन्न हुई।
सिंगोली का भी इस प्रसंग से विशेष संबंध था। वर्ष 2017 में वहाँ चातुर्मास की प्रबल संभावना थी, किंतु अंतराय कर्म के उदयवश वह सौभाग्य उन्हें प्राप्त नहीं हो सका और चातुर्मास बोराव को मिला।
इस बार भी सिंगोली के श्रद्धालुओं के मन में स्वाभाविक आशा थी।
आहारचर्या के पश्चात लगभग एक बजे पुनः विहार प्रारंभ हुआ।
और जैसे-जैसे मुनिसंघ के चरण आगे बढ़ते गए, वैसे-वैसे सिंगोली की इस वर्ष की चातुर्मास-आशा भी पीछे छूटती चली गई।
सिंगोली से लगभग नौ किलोमीटर आगे बोराव ग्राम था। पूज्य मुनिश्री का स्वभाव रहा है कि जहाँ उनका पूर्व में चातुर्मास हो चुका हो, वहाँ पुनः रुकना यथासंभव टालते हैं। उस दिन भी उनका विचार बोराव से पाँच-छह किलोमीटर आगे किसी अन्य स्थान पर रात्रि विश्राम करने का था।
लेकिन कभी-कभी श्रद्धा के आगे प्रकृति भी मानो अपना निर्णय बदल देती है।वर्षाकाल प्रारंभ हो चुका था। चित्तौड़गढ़ से निकलने के बाद तक पूरे मार्ग में वर्षा और सुहावना मौसम मिलता रहा था। किंतु उस दिन अचानक मौसम का स्वरूप बदल गया। तेज धूप और भीषण गर्मी ने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। ऐसा लग रहा था मानो आषाढ़ नहीं, ज्येष्ठ का महीना चल रहा हो।
बोराव पहुँचने से पहले के उन नौ किलोमीटर में पूज्य मुनिश्री को दो बार विश्राम करना पड़ा।संयोग देखिए, जिन स्थानों में से एक पर उस दिन विश्राम हुआ, ठीक उसी स्थान पर पिछले वर्ष 2017 में भी सिंगोली से बोराव विहार के दौरान अत्यधिक गर्मी के कारण विश्राम करना पड़ा था।
अंततः बोराव समाज का निवेदन स्वीकार कर लिया गया और उस दिन का रात्रि विश्राम बोराव में ही हुआ।
लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह सभी के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था।
जैसे ही मुनिसंघ का बोराव में प्रवेश हुआ, अचानक तेज वर्षा प्रारंभ हो गई। कुछ ही क्षणों में वातावरण शीतल हो गया।
मानो केवल धरती ही नहीं, बल्कि बोराव समाज के हृदय भी तृप्त हो उठे हों।उस दिन पुनः पूज्य मुनिसंघ के साथ विहार करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
श्रद्धालुओं के अत्यंत आग्रह पर पूज्य मुनिश्री ने अगले दिन प्रातः विहार न करने का निवेदन भी स्वीकार कर लिया।
बोराव स्थित विज्ञान फिलिंग स्टेशन, जो आर्यिका श्रेष्ठ विज्ञानमती माताजी के परम भक्त परिवार का है, वहाँ भी एक विशेष प्रसंग जुड़ा हुआ था। वर्ष 2017 के चातुर्मास में शरद पूर्णिमा के अवसर पर, जो पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का अवतरण दिवस भी है, राजस्थान का प्रथम संयम कीर्ति स्तंभ वहीं स्थापित किया गया था।
संयोग से उसी दिन पूज्य मुनिश्री विनीत सागर जी महाराज का दीक्षा दिवस भी था। स्वास्थ्य अनुकूल न होने के कारण वे उस कार्यक्रम में नहीं पहुँच सके थे; केवल पूज्य मुनिश्री चंद्रप्रभ सागर जी महाराज ही वहाँ गए थे।
उस गुरुभक्त परिवार की हार्दिक इच्छा थी कि यदि बोराव में रात्रि विश्राम न भी हो, तो कम से कम दस मिनट के लिए विज्ञान फिलिंग स्टेशन पर रुककर पूज्य मुनिश्री प्रवचन प्रदान करें। किंतु उस समय यह निवेदन स्वीकार नहीं हुआ था।
परंतु गुरु-भक्ति का फल शायद कुछ और ही निर्धारित था।
जिस परिवार ने केवल दस मिनट का सान्निध्य माँगा था, उसे उसी स्थान पर रात्रि विश्राम, अगले दिन की आहारचर्या और भरपूर सान्निध्य का अप्रत्याशित सौभाग्य प्राप्त हुआ।
गुरु-कृपा जब बरसती है, तो वह मनुष्य की कल्पना से कहीं अधिक देती है।
आगे की और जानकारी अगले भाग में
सिद्धार्थ जैन बाबरिया रामगंजमंडी आलेख
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
