350 किमी पदविहार के बाद गुरु की तपोभूमि पहुंचे मुनिश्री निष्पक्षसागर, भावुक होकर बोले— “आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज की तपोस्थली आकर मन तृप्त हो गया”
अजमेर की पावन दीक्षास्थली पर गुरु-भक्ति का अनुपम दृश्य, मुनिद्वय ने नमन कर भाव-विभोर किया श्रद्धालुओं को
अजमेर।
गुरु केवल मार्गदर्शक नहीं, बल्कि आत्मकल्याण की यात्रा के प्रेरणास्रोत होते हैं। यही गुरु-भक्ति शनिवार को अजमेर की पावन धरा पर साकार होती दिखाई दी, जब लगभग 350 किलोमीटर का कठिन पदविहार पूर्ण कर मुनिश्री 108 निष्पक्षसागर महाराज एवं मुनिश्री 108 निस्पृहसागर महाराज अपने आराध्य आचार्य श्री 108 विद्यासागरजी महाराज की दीक्षास्थली एवं तपोभूमि अजमेर पहुंचे। जैसे ही दोनों मुनिराज इस पावन भूमि पर पहुंचे, उनके मुख पर श्रद्धा, विनम्रता और आत्मिक आनंद के भाव स्पष्ट झलकने लगे। उन्होंने तपोभूमि को श्रद्धापूर्वक नमन किया तो उपस्थित श्रद्धालु भी इस भावुक क्षण के साक्षी बन गए।
शनिवार प्रातः मुनिद्वय ने सोनीजी की नसियां से मंगल विहार प्रारंभ किया। मार्ग में आनंद नगर जैन मंदिर सहित विभिन्न स्थानों पर श्रद्धालुओं ने पाद-प्रक्षालन, चरण वंदना एवं मंगल अगवानी कर पुण्यार्जन किया। पार्श्वनाथ कॉलोनी स्थित दिगंबर जैन मंदिर पहुंचने पर समाजजनों ने जयघोष, पुष्पवर्षा और मंगल गीतों के बीच उनका भव्य स्वागत किया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री108 निष्पक्षसागर महाराज ने कहा, “350 किलोमीटर का पदविहार कर आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज की दीक्षास्थली एवं तपोस्थली अजमेर पहुंचकर मन तृप्त हो गया। यह भूमि केवल इतिहास नहीं, बल्कि तप, त्याग, साधना और आत्मानुभूति की जीवंत प्रेरणा है। यहां पहुंचते ही मन स्वतः भक्ति और शांति से भर जाता है।”
गुरु-शिष्य परंपरा का जीवंत और प्रेरक उदाहरण
आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के प्रति मुनिश्री निष्पक्षसागर महाराज एवं मुनिश्री निस्पृहसागर महाराज का समर्पण उस समय देखने योग्य था, जब उन्होंने तपोभूमि को बार-बार नमन कर गुरु के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा व्यक्त की। यह दृश्य बता रहा था कि सच्चा शिष्य केवल गुरु के उपदेशों का अनुयायी ही नहीं होता, बल्कि उनके तप, त्याग और आदर्शों को जीवन में आत्मसात करने का संकल्प भी लेकर चलता है। उपस्थित श्रद्धालुओं ने इस भावपूर्ण क्षण को गुरु-भक्ति की अविस्मरणीय अनुभूति के रूप में देखा।
यहीं से प्रारंभ हुई थी युगपुरुष आचार्य विद्यासागरजी महाराज की संयम यात्रा
अजमेर की यह पुण्यभूमि जैन इतिहास का गौरवशाली अध्याय समेटे हुए है। 30 जून 1968 (आषाढ़ शुक्ल पंचमी) को इसी धरा पर महाकवि आचार्य श्री 108 ज्ञानसागर महाराज ने युवा विद्याधर को मुनि दीक्षा प्रदान कर मुनिश्री 108 विद्यासागर महाराज नाम दिया था। कहा जाता है कि उस दिव्य अवसर पर झमाझम वर्षा हो रही थी, मानो प्रकृति स्वयं इस ऐतिहासिक क्षण का अभिनंदन कर रही हो। यहीं से प्रारंभ हुई संयम और तपस्या की वह यात्रा आगे चलकर करोड़ों लोगों के लिए धर्म, संस्कृति, राष्ट्रचेतना और आत्मकल्याण का प्रकाशपुंज बन गई।
आज भी अजमेर की यह तपोस्थली असंख्य श्रद्धालुओं और साधकों के लिए श्रद्धा, साधना और गुरु-भक्ति का अमर तीर्थ बनी हुई है।
— अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो. 9929747312


