भाग–3  25 जुलाई 2018 एक ऐसा दिन जिस रामगंजमंडी कभी नहीं भूल सकती अंतिम पड़ाव… और रामगंज मंडी की ऐतिहासिक बेला

विनीत साग़र जी महाराज

भाग–3  25 जुलाई 2018 एक ऐसा दिन जिस रामगंजमंडी कभी नहीं भूल सकती अंतिम पड़ाव… और रामगंज मंडी की ऐतिहासिक बेला

 

बोराव में रात्रि विश्राम तथा अगले दिन आहारचर्या सम्पन्न होने के पश्चात पूज्य मुनिद्वय ने चौके से ही विहार प्रारम्भ कर दिया। सामान्यतः आहार के उपरांत सामायिक कर पुनः विहार होता था, किंतु उस दिन समय की आवश्यकता को देखते हुए सीधे विहार किया गया। लगभग सात किलोमीटर आगे लोटियाना ग्राम में सामायिक सम्पन्न हुई और उसके पश्चात पुनः विहार करते हुए भैंसरोड़गढ़ में रात्रि विश्राम हुआ।

 

अगले दिन प्रातः भैंसरोड़गढ़ से विहार प्रारम्भ हुआ। मार्ग में पुनः मुनिसंघ के साथ विहार करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। दोपहर तक रावतभाटा के नीचे बाजार स्थित जिनालय में आहारचर्या सम्पन्न हुई।

 

एक दिन बोराव में अतिरिक्त रुकने के कारण समय का संतुलन कुछ बदल गया था। संभवतः उसी की पूर्ति के लिए उस दिन भी पूज्य मुनिद्वय ने चौके से ही विहार कर दिया। रावतभाटा के नया बाजार स्थित जिनालय में वंदना करने के पश्चात लगभग पाँच किलोमीटर दूर दीपपुरा घाटे स्थित वन विभाग की चौकी पर सामायिक सम्पन्न हुई।

 

यहीं एक और संभावना समाप्त हो गई।रावतभाटा भी चातुर्मास की दौड़ से बाहर हो चुका था।अब मार्ग में केवल एक ही प्रमुख स्थान शेष था—रामगंजमंडी

सामायिक के पश्चात पुनः विहार प्रारम्भ हुआ। उस दिन आहार के बाद लगभग 28 किलोमीटर का लंबा विहार करते हुए मुनिसंघ जालखेड़ा मॉडल स्कूल पहुँचा, जहाँ रात्रि विश्राम हुआ।

 

 

 

उस रात्रि पूज्य मुनिश्री विनीत सागर जी महाराज की वैयावृत्ति करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

वैयावृत्ति के दौरान उन्होंने सहज भाव से पूछा—इसके आगे कोई स्थान नहीं था क्या?”

 

मैंने विनम्रता से कहा—

 

“महाराज श्री, आहार के बाद ही 28 किलोमीटर का विहार हो गया है। अब आगे कैसे चलते? चरणों का भी तो विचार करना चाहिए।”

मेरी बात सुनकर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा—”अगली समाज यहाँ से केवल 16 किलोमीटर है। अभी भी चले जाते तो रात्रि विश्राम तक सारी थकान उतर जाती। सुबह का विहार भी लंबा नहीं करना पड़ता।”

 

 

 

उनके उत्तर ने मुझे भीतर तक आश्चर्यचकित कर दिया।जहाँ हम 28 किलोमीटर को अत्यधिक मान रहे थे, वहीं उनके लिए वह भी पर्याप्त नहीं था। संयम, सहनशक्ति और तप का ऐसा अद्भुत स्वरूप प्रत्यक्ष देखकर मन श्रद्धा से भर उठा।

 

उस रात मुझे पूज्य मुनिश्री के पाटे के समीप ही विश्राम करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।अगले दिन प्रातः पुनः विहार प्रारम्भ हुआ। लगभग 16 किलोमीटर चलकर चेचट पहुँचे, जहाँ आहारचर्या सम्पन्न हुई।

 

तिथि थी—24 जुलाई 2018, आषाढ़ शुक्ल द्वादशी।अब 

रामगंजमंडी मात्र 19 किलोमीटर दूर रह गई थी। पूज्य मुनिश्री तो एक ही विहार में रामगंज मंडी पहुँच सकते थे। किंतु समाज के अत्यंत विनम्र और बार-बार किए गए निवेदन को स्वीकार करते हुए उन्होंने अगले दिन प्रातः नगर प्रवेश की अनुमति प्रदान की।उस दिन का रात्रि विश्राम मोड़क मांगलिक भवन में हुआ।

 

 

25 जुलाई 2018 — प्रतीक्षा का अंत

आखिर वह प्रभात भी आ गया, जिसकी प्रतीक्षा वर्षों से थी।

25 जुलाई 2018 की वह सुबह रामगंजमंडी के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से अंकित हो गई।

 

पूरा नगर मानो एक नववधू की भाँति सुसज्जित था। मार्ग-मार्ग पर स्वागत द्वार बनाए गए थे। प्रत्येक चौराहा, प्रत्येक गली और प्रत्येक घर श्रद्धा से आलोकित दिखाई दे रहा था।

 

सैकड़ों महिलाएँ अपने मस्तक पर मंगल कलश धारण किए मुनिसंघ के आगे-आगे चल रही थीं। नगर के प्रत्येक नागरिक के हृदय में अपार उल्लास था।

 

चारों ओर केवल एक ही भावना थी—आज हमारा नगर धन्य हो गया।”

वाद्ययंत्रों की मधुर ध्वनि के बीच पूरा नगर अपने आराध्य गुरुवरों के स्वागत में उमड़ पड़ा था।

 

किन्तु यह भव्यता भी पूर्ण सादगी से ओतप्रोत थी।न कोई आडंबर, न दिखावा, न अनावश्यक खर्च।

 

पूज्य मुनिद्वय को ऐसा कोई प्रदर्शन कभी स्वीकार नहीं था। इसलिए स्वागत की प्रत्येक व्यवस्था उनकी मर्यादा और संयम के अनुरूप ही थी।

 

नगरवासी अपने-अपने घरों के बाहर खड़े होकर श्रद्धापूर्वक मुनिसंघ के चरणों का प्रक्षालन कर स्वयं को धन्य मान रहे थे।

 

पंद्रह वर्षों के लंबे अंतराल के बाद, वर्ष 2003 में पूज्य मुनिश्री क्षमासागर जी महाराज के चातुर्मास के पश्चात, पुन

रामगंजमंडी को आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज संघ के शिष्यों का चातुर्मास मिला यह परम सौभाग्य प्राप्त हुआ था।

 

यह केवल एक चातुर्मास नहीं था।

यह गुरु-कृपा का प्रत्यक्ष प्रसाद था।

 

उसी दिन रामगंजमंडी में आहारचर्या सम्पन्न हुई।

 

पूज्य मुनिश्री विनीत सागर जी महाराज के प्रथम आहारदान का सौभाग्य राजमल पदमकुमार अभिषेक लुहाड़िया परिवार को प्राप्त हुआ।

 

वहीं पूज्य मुनिश्री चंद्रप्रभ सागर जी महाराज के प्रथम आहारदान का सौभाग्य ब्रह्मचारिणी रीना दीदी तथा गणेशलाल जी ढाबला वाले परिवार को प्राप्त हुआ।

 

वर्षों की प्रतीक्षा, असंख्य प्रार्थनाएँ, अनगिनत निवेदन और अनंत विश्वास…सबकुछ उस दिन साकार हो चुका था।

 

रामगंजमंडी ने अपने गुरुवरों का स्वागत ही नहीं किया था, बल्कि अपने हृदय के द्वार खोलकर उन्हें सदैव के लिए अपनी स्मृतियों में प्रतिष्ठित कर लिया था।

आगे की जानकारी और अगले भाग में

       सिद्धार्थ जैन बाबरिया रामगंजमंडी से प्राप्त आलेख 

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