“जो सुख अपने लिए चाहते हो, वही दूसरों के लिए भी चाहो” — मुनि योगसागर जी महाराज का मानवता को संदेश, सिद्धचक्र महामंडल विधान में उमड़ा श्रद्धा का सागर
पुण्योदय अतिशय क्षेत्र नसियां जी में सिद्धचक्र महामंडल विधान के चौथे दिन भक्ति, साधना और आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत संगम, मंगलाचरण और लोककल्याण पर मुनिश्री का प्रेरक प्रवचन
कोटा, 24 जुलाई।
श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी (दादाबाड़ी) में निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में चल रहे श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान महोत्सव के चौथे दिन श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुपम वातावरण देखने को मिला। प्रातःकाल से ही मंदिर परिसर णमोकार महामंत्र, जिनवाणी और भक्तिरस से गुंजायमान रहा। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने अभिषेक, शांतिधारा, पूजन, विधान एवं मंगल आरती में सहभागिता कर आत्मकल्याण के साथ समस्त जीवों के मंगल की कामना की।
मंदिर के निदेशक हुकम जैन ‘काका’ एवं अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि भगवान श्री आदिनाथ का अभिषेक, शांतिधारा एवं सिद्धचक्र महामंडल विधान विधि-विधानपूर्वक संपन्न हुआ। श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से अर्घ्य समर्पित कर पुण्य अर्जित किया।

“धर्म वही, जो सबके सुख की कामना करे”
धर्मसभा को संबोधित करते हुए निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि धर्म जीवन का सर्वोच्च रत्न है। धर्म को जीवन में धारण करने वाला व्यक्ति ही वास्तविक सुख, शांति और आत्मानंद का अनुभव करता है।

उन्होंने कहा कि भगवान की दिव्य वाणी आत्मा को निर्मल बनाती है और मोक्षमार्ग का प्रकाश करती है। इसलिए प्रत्येक शुभ कार्य का प्रारंभ मंगलाचरण से किया जाता है।

मुनिश्री ने कहा कि मंगलाचरण श्रद्धा, विनय और कृतज्ञता का प्रतीक है। यह तीन प्रकार का होता है—प्रथम मंगल, मध्य मंगल और अंत मंगल। इससे मन के भाव निर्मल होते हैं, पुण्य की वृद्धि होती है तथा प्रत्येक शुभ कार्य सफलता और मंगल के साथ पूर्ण होता है।
“जो सुख अपने लिए चाहते हो, वही दूसरों के लिए भी चाहो”
अपने प्रेरक प्रवचन में मुनिश्री ने भगवान महावीर के वर्धमान स्वरूप की व्याख्या करते हुए कहा कि धर्म किसी जाति, संप्रदाय या व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं है। धर्म करुणा, समता, शुद्ध परिणाम और लोककल्याण की भावना का नाम है।
उन्होंने कहा,> “जो सुख अपने लिए चाहते हो, वही दूसरों के लिए भी चाहो — यही सच्चा धर्म है।”
मुनिश्री ने कहा कि जब तक समाज का प्रत्येक व्यक्ति सुखी और प्रसन्न नहीं होगा, तब तक किसी का व्यक्तिगत सुख भी पूर्ण नहीं हो सकता। इसलिए धर्म का वास्तविक उद्देश्य समस्त जीवों के कल्याण का भाव जगाना है।

128 ऋद्धियों के अर्घ्य के साथ सम्पन्न हुए धार्मिक अनुष्ठान
मुख्य संयोजक धर्मचंद जैन धानोप्या एवं अर्चना (रानी) सर्राफ ने बताया कि चतुर्थ दिवस 128 ऋद्धियों के अर्घ्य अत्यंत श्रद्धा और भक्तिभाव से समर्पित किए गए। श्रद्धालुओं ने अभिषेक, पूजन, अर्घ्य समर्पण और मंगल आरती में भाग लेकर धर्मलाभ अर्जित किया। पूरा मंदिर परिसर णमोकार महामंत्र, जैन भक्ति गीतों और जयघोष से गूंज उठा। विश्वशांति, आत्मकल्याण एवं समस्त प्राणियों के मंगल की कामना के साथ विधान संपन्न हुआ।
आज के पुण्यार्जक
समिति के महामंत्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री राजेन्द्र–श्री हुकम जैन ‘काका’ हरसोरा परिवार तथा श्रीमती सुशीला एवं श्री विवेक ठोरा परिवार द्वारा किया गया।
समिति के उपाध्यक्ष सुमित जैन एवं मनोज बगड़ा ने बताया कि दीप प्रज्वलन, श्रावक श्रेष्ठी एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्री संजय एवं श्रीमती बीना लुहाड़िया परिवार ने किया। वहीं भक्तामर विधान एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्री बहादुरमल, श्रीमती सुशीला, श्रीमती कमलेश एवं श्री चक्रेश कोटिया परिवार को प्राप्त हुआ।
प्रशासनिक मंत्री पारस दोराया ने बताया कि मुनिश्री के आहारदान का सौभाग्य श्री तेजकुमार जैन एवं श्रीमती कमलेश खटोड़ परिवार को प्राप्त हुआ।
— संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

