“बार-बार टोकना नहीं, अपनों की चिंता का संकेत है” — अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागर महाराज का परिवारों को भावुक संदेश

“प्रेम से देखें, प्यार से सुनें और जाने दें, अन्यथा वृद्धाश्रम की तैयारी रखिए” — बदलते पारिवारिक रिश्तों पर संत का मार्मिक चिंतन
पुष्पगिरी, सोनकच्छ।
बदलते सामाजिक परिवेश और पारिवारिक रिश्तों में बढ़ती दूरियों पर अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज ने अत्यंत मार्मिक और विचारोत्तेजक संदेश देते हुए कहा कि घर-परिवार के बड़े-बुजुर्ग यदि बार-बार पूछते हैं, किसी बात पर टोकते हैं या गलती होने पर डांटते हैं, तो उसे हस्तक्षेप नहीं बल्कि उनके स्नेह, चिंता और अपनत्व का प्रतीक समझना चाहिए।
गुरुभक्तों को संबोधित करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि “प्रेम से देखें, प्यार से सुनें और जाने दें, अन्यथा अपना बोरिया-बिस्तर वृद्धाश्रम के लिए तैयार रखिए।” उन्होंने कहा कि 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की अल्पकालिक स्मरण शक्ति (Short-Term Memory) स्वाभाविक रूप से कम होने लगती है। ऐसे में उनका बार-बार पूछना भूलने की आदत नहीं, बल्कि अपने परिवार के प्रति गहरी चिंता और लगाव का परिचायक है।
आचार्यश्री ने कहा कि बुजुर्ग अपनी संतान और परिवार को खोना नहीं चाहते। उम्र के इस पड़ाव पर उनकी जीवन गति धीमी हो जाती है और समय के साथ-साथ अकेलेपन का भय उन्हें बार-बार घेरता है। वे हर पल अपनों की कुशलक्षेम जानना चाहते हैं और यही कारण है कि वे बार-बार पूछते या टोकते हैं।
उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज के समय में 50 प्रतिशत से अधिक बुजुर्ग अकेलेपन का जीवन जी रहे हैं। परिवार के सदस्यों के पास उनके साथ बैठने, दो बातें करने या उनका हालचाल पूछने तक का समय नहीं है। घर लौटते ही हर व्यक्ति अपने कमरे और मोबाइल की दुनिया में खो जाता है। आज की पीढ़ी सोशल मीडिया पर घंटों सक्रिय रहती है, लेकिन अपने ही घर के बुजुर्गों के साथ कुछ पल बिताने का समय नहीं निकाल पाती।
आचार्यश्री ने संयुक्त परिवार व्यवस्था का स्मरण कराते हुए कहा कि पहले परिवार में सभी सदस्य साथ रहते, साथ भोजन करते और सुख-दुख साझा करते थे। इससे बुजुर्गों का मन भी प्रसन्न रहता था। लेकिन महानगरों की फ्लैट संस्कृति और व्यस्त जीवनशैली ने पारिवारिक आत्मीयता को कमजोर कर दिया है, जिसका सबसे अधिक असर बुजुर्गों पर पड़ रहा है।
अपने उद्बोधन के अंत में आचार्यश्री ने बुजुर्गों से भी भावपूर्ण आग्रह करते हुए कहा कि “जिन लोगों को आपके खोने से कोई फर्क नहीं पड़ता, उन्हें बार-बार समझाना, टोकना या डांटना छोड़ दीजिए। अपने मन की शांति और आत्मसम्मान को प्राथमिकता दीजिए।”
आचार्यश्री का यह संदेश उपस्थित श्रद्धालुओं के हृदय को स्पर्श कर गया और सभी ने इसे वर्तमान समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक एवं आत्ममंथन कराने वाला बताया।
प्राप्त जानकारी: प्रचार-प्रसार संयोजक रोमिल पाटणी (सोनकच्छ), नरेंद्र अजमेरा, पीयूष कासलीवाल (औरंगाबाद)
संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी। 9929747312

