मंत्रों की शक्ति शब्दों में नहीं, भावों में है; भावपूर्वक जप से ही मिलता है आत्मानुभूति का आनंद : राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज
अष्टान्हिका महापर्व में श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के तीसरे दिन बोले राष्ट्रसंत— ‘ॐ ह्रीं अ सि आ ऊ सा नमः’ मंत्र अहंकार का क्षय कर आत्मा को परमात्मा से जोड़ता है
मधुबन।
“मंत्रों का वास्तविक प्रभाव केवल उनके उच्चारण में नहीं, बल्कि उनके अर्थ, श्रद्धा और अंतर्मन की भावनाओं में निहित है। जब साधक मंत्रों को आत्मसात कर भावपूर्वक जप करता है, तभी उसकी साधना सफल होती है और आत्मा परमात्मा के निकट पहुंचती है।” यह प्रेरणादायी संदेश राष्ट्रसंत मुनि श्री 108 प्रमाण सागर महाराज ने गुणायतन में अष्टान्हिका महापर्व के अंतर्गत आयोजित नौ दिवसीय श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के तृतीय दिवस 32 अर्घ समर्पित कराते हुए दिया।

राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि मुनिश्री ने अपने मंगल प्रवचन में मंत्रों के आध्यात्मिक रहस्य का सरल एवं गहन विवेचन करते हुए कहा कि “ॐ” सिद्धत्व का प्रवेश द्वार, पंचपरमेष्ठी का सार और परम चेतना का प्रतीक है। वहीं “ह्रीं” ऐसा बीज मंत्र है, जो जीव के राग, द्वेष और कषायों का हरण कर उसे निर्मलता एवं सिद्धत्व की ओर अग्रसर करता है।
उन्होंने बताया कि “अ सि आ ऊ सा” पंचपरमेष्ठी की संपूर्ण आराधना का महामंत्र है, जिसमें अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु का स्मरण समाहित है। वहीं “नमः” अहंकार के विसर्जन, विनय और समर्पण का प्रतीक है। मुनिश्री ने कहा कि “ॐ ह्रीं अ सि आ ऊ सा नमः” का भावपूर्वक जाप साधक को अहंकार से मुक्त कर आत्मा को परमात्मा के निकट पहुंचाता है।

आत्मा का स्वभाव है परमशुद्ध चैतन्य
मुनिश्री ने तृतीय दिवस के प्रथम मंत्र “ॐ ह्रीं परमशुद्धचैतन्याय नमः स्वाहा” की व्याख्या करते हुए कहा कि आत्मा का वास्तविक स्वरूप परमशुद्ध चैतन्य है। संसार के कर्म और विकार आत्मा के स्वभाव नहीं, बल्कि अस्थायी आवरण हैं। साधना का उद्देश्य इन आवरणों को हटाकर आत्मा के शुद्ध स्वरूप का अनुभव करना है।
उन्होंने कहा कि यदि मंत्र केवल होंठों तक सीमित रह जाएं और मन भटकता रहे, तो साधना अधूरी रह जाती है। प्रत्येक मंत्र का उच्चारण श्रद्धा, एकाग्रता और आत्मजागरण के भाव से होना चाहिए।
सिद्धचक्र विधान आत्मशुद्धि का मार्ग
राष्ट्रसंत ने कहा कि सिद्धचक्र विधान का प्रत्येक मंत्र साधक को आत्मा के शुद्ध स्वरूप की ओर ले जाने वाला एक दिव्य सोपान है। शुद्ध ज्ञान, शुद्ध चिद्रूप, शुद्ध स्वभाव, शुद्ध भावना और शुद्ध सुख आत्मा के स्वाभाविक गुण हैं। इनके निरंतर चिंतन से साधक बाह्य आसक्ति से मुक्त होकर आत्मानुभूति की दिशा में आगे बढ़ता है।
अपने साधना अनुभव साझा करते हुए मुनिश्री ने कहा कि मंत्र-जाप के दौरान उनका मन पूर्णतः परमात्मा में लीन हो जाता है और भीतर से आनंद का अविरल स्रोत प्रवाहित होने लगता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे मंत्रों को केवल रटें नहीं, बल्कि उनके अर्थ और भाव में डूबकर जप करें।
प्रतिदिन इन मंत्रों के जप की प्रेरणा
मुनिश्री ने सभी साधकों को प्रतिदिन “ॐ सम्यग्दर्शनाय नमः”, “ॐ सम्यग्ज्ञानाय नमः”, “ॐ सम्यक्चरित्राय नमः” तथा “ॐ ह्रीं अ सि आ ऊ सा नमः” मंत्रों का भावपूर्वक जप करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि भक्ति, जाप और ध्यान तभी सार्थक होते हैं, जब उनमें अंतःकरण की तन्मयता और आत्मानुभूति का समावेश हो।
प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि प्रातःकालीन मंगल प्रवचन के बाद भगवान का अभिषेक एवं मुनिश्री के मुखारविंद से शांतिधारा संपन्न हुई। संगीतकारों की भक्तिमय प्रस्तुतियों तथा कोलकाता के मुन्ना पहाड़िया की मधुर भक्ति-धुनों ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
अष्टान्हिका महापर्व के अंतर्गत आयोजित श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान में राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज के साथ मुनि श्री संधान सागर महाराज, मुनि श्री सार सागर महाराज, मुनि श्री समादर सागर महाराज एवं मुनि श्री रूप सागर महाराज सहित श्री सम्मेद शिखरजी तीर्थ पर विराजमान अनेक साधुगणों का पावन सान्निध्य प्राप्त हुआ। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने विधान में सहभागिता कर भावपूर्ण मंत्र-साधना का लाभ अर्जित किया।
अविनाश जैन विद्यावाणी से प्राप्त जानकारी संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

