आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के 59वें दीक्षा दिवस पर आचार्य विद्यासागर महाराज को दी गई भावभीनी विनयांजलि, आचार्य श्री सुनीलसागर जी महाराज ने सुनाए  प्रेरक संस्मरण

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आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के 59वें दीक्षा दिवस पर आचार्य विद्यासागर महाराज को दी गई भावभीनी विनयांजलि, आचार्य श्री सुनीलसागर जी महाराज ने सुनाए  प्रेरक संस्मरण

“बाल्यकाल में मिले गुरु संस्कार ही जीवन को साधना और संयम की दिशा देते हैं” — आचार्य सुनील सागर जी महाराज

विजयनगर (इंदौर), 18 जुलाई।

परम पूज्य आचार्य श्री 108 सुनीलसागर जी महाराज ने उदयनगर से मंगल विहार करते हुए शनिवार प्रातः विजयनगर स्थित दिगम्बर पंचबालयती जैन मंदिर में मंगल प्रवेश किया। इस अवसर पर आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के 59वें मुनि दीक्षा दिवस पर आयोजित विशेष विनयांजली सभा में उन्होंने  पूज्य गुरुदेव को भावभीनी विनयांजलि अर्पित की तथा गुरु सान्निध्य से जुड़े अनेक प्रेरक संस्मरण सुनाकर श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।

 

आचार्य श्री ने कहा कि ढाई वर्ष की आयु में किसी बालक को संसार की अधिक समझ नहीं होती, फिर भी कुछ सौभाग्यशाली आत्माओं को बचपन से ही निर्ग्रन्थ तपोधन संतों का सान्निध्य और आशीर्वाद प्राप्त हो जाता है। ऐसे दिव्य संस्कार ही आगे चलकर व्यक्ति के जीवन की दिशा और दशा बदल देते हैं।

उन्होंने बताया कि नैनागिरि में आचार्य विद्यासागर जी महाराज की कठोर साधना, तप और आहारचर्या को देखकर बालक संदीप (वर्तमान आचार्य सुनीलसागर जी) के मन में भी संयममय जीवन अपनाने का संकल्प जागृत हुआ। पूज्य मुनिराजों के सान्निध्य में बाल्यावस्था में प्राप्त संस्कार समय के साथ विशाल वटवृक्ष बनकर जीवन को साधना, त्याग और आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर करते हैं।

अपने भावपूर्ण संस्मरणों में आचार्य श्री ने बताया कि उन्हें अनेक अवसरों पर आचार्य विद्यासागर जी महाराज के निकट रहने का दुर्लभ सौभाग्य प्राप्त हुआ। प्रवचन के उपरांत जब गुरुदेव सामायिक एवं रात्रि विश्राम के लिए मंदिर परिसर में जाते थे, तब अधिकांश लोग लौट जाते थे, किंतु कुछ ही साधकों को उनके निकट सेवा का अवसर मिलता था। ऐसे ही पावन क्षणों में उन्हें गुरुदेव की सेवा तथा उनके पादप्रक्षालन का भी परम सौभाग्य प्राप्त हुआ, जिसे उन्होंने अपने जीवन की अमूल्य आध्यात्मिक निधि बताया।

आचार्य सुनीलसागर जी महाराज ने कहा कि संतों का सान्निध्य केवल आध्यात्मिक प्रेरणा ही नहीं देता, बल्कि मनुष्य के जीवन में संयम, साधना, सेवा और श्रेष्ठ संस्कारों का संचार भी करता है। गुरु के प्रति समर्पण और उनके बताए मार्ग पर चलना ही सच्ची गुरु-भक्ति है।

आचार्य श्री के ओजस्वी एवं भावपूर्ण उद्बोधन को सुनकर उपस्थित श्रद्धालु गुरु स्मृतियों में भावविभोर हो उठे और पूरे वातावरण में श्रद्धा, भक्ति एवं गुरु-वंदना का अनुपम भाव व्याप्त हो गया।

— जानकारी: माही जैन धीरावत

संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

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