AI नहीं, Spiritual Intelligence बचाएगी मानवता का भविष्य : राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज

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AI नहीं, Spiritual Intelligence बचाएगी मानवता का भविष्य : राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज

 

गुणायतन के शंका समाधान कार्यक्रम में बोले— AI के साथ SA (Spiritual Intelligence) भी विकसित करें, आधुनिकता और आध्यात्मिकता का समन्वय ही सुरक्षित भविष्य की कुंजी

 

गिरीडीह।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के तेजी से बढ़ते प्रभाव के बीच राष्ट्रसंत मुनि श्री 108 प्रमाण सागर महाराज ने स्पष्ट संदेश दिया कि “AI के युग में आध्यात्मिकता ही मानवीय मूल्यों की रक्षा कर सकती है।” उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक जितनी आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक Spiritual Intelligence (SA) भी है। यदि तकनीक के साथ आध्यात्मिक चेतना विकसित नहीं हुई तो मानवता संवेदनाओं, करुणा और विवेक से दूर होती चली जाएगी।

 

 

गुणायतन में आयोजित शंका समाधान कार्यक्रम में राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ के प्रश्नों का उत्तर देते हुए मुनिश्री ने कहा कि तकनीक स्वयं समस्या नहीं है, बल्कि उसका उपयोग करने वाला मनुष्य महत्वपूर्ण है। यदि व्यक्ति के भीतर आध्यात्मिकता है तो AI उसके विकास का माध्यम बनेगी, अन्यथा वही तकनीक संकट का कारण भी बन सकती है।

मुनिश्री ने कहा कि “AI (Artificial Intelligence) के साथ SA (Spiritual Intelligence) भी विकसित करें। आधुनिकता और आध्यात्मिकता का समन्वय ही मानवता के सुरक्षित और उज्ज्वल भविष्य का आधार है।” उन्होंने बताया कि आधुनिक तकनीक को आध्यात्मिक दृष्टि के साथ अपनाने वाला व्यक्ति समय के साथ आगे बढ़ता है और उसका जीवन भी संतुलित रहता है।

 

 

उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का निर्माण भी मानव मस्तिष्क की अद्भुत क्षमता का परिणाम है। AI का विकास मानव के न्यूरल सिस्टम से प्रेरित होकर हुआ है। यदि मनुष्य अपनी बुद्धि से इतनी उन्नत तकनीक बना सकता है तो आध्यात्मिक साधना के माध्यम से वह अपने व्यक्तित्व और चेतना को इससे कहीं अधिक ऊँचाइयों तक पहुँचा सकता है।

 

सच्ची श्रद्धा हो तो अभक्ष्य का सेवन संभव नहीं

 

एक अन्य प्रश्न के उत्तर में मुनिश्री ने कहा कि यदि देव, शास्त्र और गुरु में सच्ची श्रद्धा है तो अभक्ष्य का सेवन संभव ही नहीं है। केवल श्रद्धा का दावा पर्याप्त नहीं, बल्कि जीवन का आचरण भी उसी के अनुरूप होना चाहिए। भगवान में श्रद्धा है तो उनकी वाणी में भी श्रद्धा होनी चाहिए, गुरु में श्रद्धा है तो उनके आदर्शों में भी और शास्त्र में श्रद्धा है तो शास्त्र जीवन का प्रमाण बनना चाहिए।

 

उन्होंने स्पष्ट किया कि सम्यग्दर्शन का संबंध केवल बाहरी क्रियाओं से नहीं, बल्कि अंतःकरण की निर्मल श्रद्धा से है। धर्मानुकूल वातावरण मिलने के बाद भी जो व्यक्ति जानबूझकर अभक्ष्य का सेवन करता है, वह जैन आचरण का सही अनुयायी नहीं कहलाता।

 

सोच बदलिए, जीवन बदल जाएगा

 

मुनिश्री ने कहा, “सोच बदलने से तपस्या बन जाती है और सोच बिगड़ने पर तपस्या भी समस्या दिखाई देने लगती है।” उन्होंने बताया कि जीवन का वास्तविक परिवर्तन परिस्थितियों से नहीं, बल्कि सोच बदलने से होता है। दूसरों के समझाने से बदलना पराधीनता है, जबकि अपने मन को स्वयं सही दिशा देना ही वास्तविक साधना है।

 

उन्होंने कहा कि जिन परिस्थितियों को बदला जा सकता है, उन्हें बदलने का प्रयास करें और जिन्हें बदलना संभव नहीं है, उन्हें सहजता से स्वीकार करें। “मन से लड़ने वाले हर जगह हार जाते हैं और मन को मोड़ने वाले जीवन-सागर से तर जाते हैं।”

 

भगवान महावीर के काल की प्रेरक घटना का उल्लेख

 

अपने प्रवचन में मुनिश्री ने भगवान महावीर के समय की एक प्रेरक घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि एक ध्यानस्थ मुनिराज क्षणभर के लिए रौद्र ध्यान में चले गए थे, किंतु आत्मबोध होते ही उनकी परिणति बदल गई और वे केवलज्ञान को प्राप्त हुए। इससे स्पष्ट होता है कि जीवन का परिवर्तन बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि मन की दिशा बदलने से होता है।

 

8 वर्षीय बालक ने पैदल पूरी की सम्मेदशिखर की 9 किमी पर्वत वंदना

 

गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि इस अवसर पर बैंकॉक निवासी मात्र 8 वर्षीय बालक ने अद्भुत श्रद्धा और उत्साह का परिचय देते हुए मुनिश्री ससंघ के साथ श्री सम्मेदशिखरजी की लगभग 9 किलोमीटर की पर्वत वंदना पैदल पूरी की। बालक की धर्मनिष्ठा और समर्पण ने उपस्थित श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।

 

इस अवसर पर गुणायतन के सीईओ सुभाष जी, वीरेन्द्र छावड़ा, धैर्य जैन (भोपाल), विवेक जैन (कुनकुरी), अक्षय जैन, आज़ाद जैन (इंदौर), अनिमेष जैन (गोमिया) सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। प्रातःकालीन शांतिधारा मुनिश्री के मुखारविंद से सम्पन्न हुई।

 

— संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

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