लोग साथ जुड़ते गए, कारवाँ बनता गया…”

धर्म

“लोग साथ जुड़ते गए, कारवाँ बनता गया…”

इन पंक्तियों को लिखने वाले कवि ने शायद जीवन का यही दृश्य कभी अपनी आँखों से देखा होगा। उसने भी अनुभव किया होगा कि इतिहास कभी भीड़ से नहीं बनता, इतिहास एक व्यक्ति के संकल्प से शुरू होता है और फिर धीरे-धीरे जनसमर्थन की गूंज उसे कारवाँ में बदल देती है।

 

आज यही दृश्य निर्यापक मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के इंदौर की ओर बढ़ते चरणों में साकार होता दिखाई दे रहा है। देखने वाले को लगता है कि गुरुदेव अकेले विहार कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि उनके पीछे केवल साधुओं का संघ नहीं, बल्कि लाखों श्रद्धालुओं की आस्था चल रही है। कदम उनके हैं, लेकिन धड़कनें पूरे इंदौर की हैं। विहार उनका है, लेकिन प्रतीक्षा पूरे समाज की है।

 

 

जैसे-जैसे गुरुदेव इंदौर के निकट आते गए, वैसे-वैसे समाज की भावनाएँ भी उमड़ती चली गईं। कोई सेवा की तैयारी में जुटा, कोई स्वागत की योजना बनाने लगा, कोई व्यवस्था संभालने लगा, तो कोई केवल इस सौभाग्य की प्रतीक्षा में दिन गिनने लगा। सचमुच—

लोग साथ जुड़ते गए… और कारवाँ बनता गया।

आज जिज्ञासा समाधान के मंच पर सकल जैन समाज ने जिस एकता, अनुशासन और समर्पण का परिचय दिया है, उसने एक स्पष्ट संदेश पूरी दुनिया तक पहुँचा दिया है कि जगत पूज्य का इंदौर प्रवेश केवल एक नगर में आगमन नहीं होगा, बल्कि एकजुट समाज की आस्था का विराट उत्सव होगा। यह आयोजन किसी संस्था, किसी एक समिति या किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समाज के सामूहिक भावों का महापर्व बनने जा रहा है।

अब पूरा विश्वास होने लगा है कि इंदौर की यह आगवानी अपने वैभव, अनुशासन, श्रद्धा और जनसमर्पण से स्वागत के पुराने अनेक कीर्तिमानों को पीछे छोड़ देगी। यह केवल भीड़ का प्रदर्शन नहीं होगा, बल्कि गुरु के प्रति समर्पण का ऐसा दृश्य होगा जिसे देखकर आने वाली पीढ़ियाँ भी प्रेरणा लेंगी।

मैं तो पूरे विश्वास के साथ कहता हूँ कि जिस दिन जगत पूज्य मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज इंदौर में प्रवेश करेंगे, उस दिन देश-विदेश के श्रद्धालुओं को वहाँ अवश्य पहुँचना चाहिए। यदि किसी ने कभी यह देखना हो कि किसी संत की आगवानी केवल फूल-मालाओं से नहीं, बल्कि अनुशासन, सेवा, समर्पण और एकात्म भाव से कैसे की जाती है, तो वह दिन एक जीवंत उदाहरण होगा।

इतिहास पुस्तकों में पढ़ा जाता है, लेकिन कुछ इतिहास आँखों से भी देखे जाते हैं। मुझे लगता है कि इंदौर ऐसा ही एक इतिहास लिखने की तैयारी में है।

मैं तो पूरी तरह तैयार हूँ।

आप भी तैयार हैं न?

श्रीश ललितपुर

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