जगत पूज्य निर्यापक श्रमण मुनिश्री सुधासागर महाराज के उपदेश रेड लाइट की तरह होते हैं समझदार व्यक्ति उसे देखकर रुक जाता है श्रीश जैन ललितपुर की कलम से
जगत पूज्य निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव श्री 108 सुधासागर जी महामुनिराज के उपदेश चौराहे की रेड लाइट की तरह होते हैं। समझदार व्यक्ति उसे देखकर रुक जाता है, क्योंकि उसे मालूम है कि दो पल का धैर्य पूरी जिंदगी बचा सकता है। लेकिन जो अहंकार में आकर लाल बत्ती तोड़ देता है, वह दुर्घटना को स्वयं निमंत्रण देता है।
गुरुदेव भी जब किसी बात पर रोक लगाते हैं, जब अनुशासन का आग्रह करते हैं, जब एकता, मर्यादा और संयम का संदेश देते हैं, तब उनका उद्देश्य किसी की स्वतंत्रता छीनना नहीं होता। वे तो आने वाली उन दुर्घटनाओं को पहले ही देख लेते हैं, जिन्हें हम अपनी सीमित दृष्टि से नहीं देख पाते। गुरु का वचन भविष्य की सुरक्षा का संकेत होता है, इसलिए वह कभी-कभी कठोर अवश्य लगता है, परंतु उसका परिणाम सदैव मंगलकारी होता है।
आज जगत पूज्य इंदौर की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में इंदौर के प्रत्येक श्रद्धालु के लिए सबसे बड़ी तैयारी स्वागत द्वार, बैनर, पुष्पवर्षा या जयघोष नहीं है। सबसे बड़ा स्वागत यह होगा कि हम गुरुदेव की एक-एक बात को अपने जीवन का नियम बना लें।
गुरु चरणों तक पहुंच जाना बड़ी बात नहीं है गुरु के विचारों तक पहुंच जाना बड़ी बात है
याद रखिए, गुरु के चरणों तक पहुँच जाना बड़ी बात नहीं है, गुरु के विचारों तक पहुँच जाना बड़ी बात है। चरणों की धूल तो एक दिन मिल जाती है, लेकिन वचनों का पालन करने का सौभाग्य विरले लोगों को मिलता है।
यदि इंदौर ने गुरुदेव के उपदेशों को आत्मसात कर लिया, यदि समाज ने व्यक्तिगत आग्रहों से ऊपर उठकर गुरु-आज्ञा को सर्वोपरि मान लिया, तो यह चातुर्मास केवल इतिहास नहीं रचेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श बन जाएगा। तब दुनिया कहेगी—इंदौर ने केवल एक संत का स्वागत नहीं किया, बल्कि उनके विचारों को अपने जीवन में प्रतिष्ठित कर दिया।
गुरु की सीख कभी रोकती नहीं, वह संभालती है
गुरु की सीख कभी रोकती नहीं, वह संभालती है। गुरु की मर्यादा कभी बाँधती नहीं, वह बिखरने से बचाती है। और जो समाज गुरु के संकेतों को समय रहते समझ लेता है, वही इतिहास में स्वर्णाक्षरों से अपना नाम लिखवाता है।
श्रीश ललितपुर

