वागड़ गौरव: शिक्षक से श्रमण बनने की ओर बढ़ते कदम
भव्यात्मा(श्री संजय कुमार दोसी) की आगामी 26 अप्रैल को पूज्य अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी गुरुदेव के अतिशय हस्त से होगी भव्य जैनेश्वरी दीक्षा
वागड़ की पावन धरा (राजस्थान) के परतापुर नगर से एक शिक्षक द्वारा “जीव से जिनेंद्र” तक पहुँचाने वाली यात्रा पर अग्रसर होना, निश्चित रूप से “श्रद्धा और वैराग्य” की अद्भुत मिसाल है।

परिचय एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
राजस्थान का वागड़ अंचल न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता, बल्कि अपनी आध्यात्मिक गहराई के लिए भी जाना जाता है। यह वागड़ ,मर्यादा शिष्योतम आचार्य श्री भरतसागर जी,आचार्य श्री रयणसागर जी व आचार्य श्री चंद्रगुप्त जी जैसे संतो की जन्म भूमि व राष्ट्र क्रांतिकारी संत आचार्य श्री तरुणसागर जी व अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी गुरुदेव की दीक्षा भूमि के रूप में जग विख्यात है,इसी वागड़ की माटी के लाल और परतापुर नगरी के गौरव, श्री संजय कुमार दोसी, आज हुमड़ जैन समाज और संपूर्ण जैन जगत के लिए प्रेरणा के केंद्र बन गए हैं। एक राजकीय शिक्षक के रूप में समाज को ज्ञान का प्रकाश देने वाले संजय जी ने अब ‘स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति’ (VRS) लेकर आत्म-कल्याण और मोक्ष मार्ग को चुन लिया है।
🔹 जन्म: 16 फरवरी 1972 (परतापुर)
🔹 माता-पिता: श्रीमती निर्मला देवी एवं श्री नथमल जी दोसी
🔹 परिवार: पुत्र चिंतन एवं पुत्री मुक्ति (जो इस वैराग्य पथ के साक्षी और संबल हैं)।
दांपत्य जीवन: मोक्ष मार्ग में सहगामी
संजय जी का विवाह 10 मई 1997 को श्रीमती मैना देवी (खोड़निया परिवार) के साथ संपन्न हुआ। गृहस्थ जीवन में प्रवेश के बाद भी इस युगल ने संसार की चकाचौंध के बजाय संयम को प्राथमिकता दी।
अद्भुत सामंजस्य:
श्रीमती मैना देवी ने न केवल सांसारिक उत्तरदायित्व निभाए, बल्कि धर्म मार्ग में भी पति के कंधे से कंधा मिलाकर पूर्ण सहयोग प्रदान किया।
साझा साधना:
दोनों ने साथ मिलकर प्रथम व द्वितीय प्रतिमा के व्रत अंगीकार किए। कठिन तपस्याएँ जैसे: 10 लक्षण, पंचमेरु, भक्तामर, ज्ञानपच्चीसी, तत्वार्थ सूत्र, सम्मेद शिखर वंदना और आचार्य 36 के उपवास आदि नियम एक साथ पूर्ण किए। यह आधुनिक युग में गृहस्थ जीवन के बीच ‘तपोमय जीवन’ का दुर्लभ उदाहरण है।
वैज्ञानिक धर्माचार्य श्री कनकनंदी जी: जीवन की नई दिशा
संजय जी के जीवन में आध्यात्मिक क्रांति का असली सूत्रपात वैज्ञानिक धर्माचार्य श्री कनकनंदी जी गुरुराज, अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी, आचार्य श्री सुंदर सागर जी व मुनि श्री आज्ञा सागर जी जैसे महाश्रमणों के सानिध्य से हुआ।
पुण्य का महासागर:
300 संतों के शिक्षागुरु, 425 ग्रंथों के रचयिता और 30 भाषाओं के प्रकांड विद्वान आचार्य श्री कनकनंदी जी गुरुराज ससंघ का पावन वर्षायोग (2025) ‘शिवगौरी आश्रम, भिलुड़ा’ में अपने स्व-पुरुषार्थ से संपन्न कराना, उनके संपूर्ण परिवार के लिए सौभाग्य की पराकाष्ठा है।
साधना का प्रभाव:
पूज्य आचार्य श्री कनकनंदी जी के क्रांतिकारी उपदेशों, उनकी अद्भुत निस्पृहता और अनुशासन ने संजय जी के जीवन को नई दिशा प्रदान की। गुरुदेव की साधना ने उन्हें सिखाया कि सच्चा ज्ञान वही है जो वैराग्य की ओर ले जाए।
🐄
साधु सेवा और सामाजिक सरोकार (1989 से अनवरत)
संजय जी का जीवन परोपकार और सेवा का जीवंत उदाहरण है:
साधु सेवा संस्थान:
आपके संरक्षण में मात्र 4 लोगों से शुरू हुए इस संस्थान ने आज 300 साधु भक्तों की विशाल फ़ौज खड़ी कर दी है। आपके ही कुशल नेतृत्व में साधु सेवा संस्थान द्वारा 3 बार श्री सम्मेद शिखर जी की निशुल्क यात्रा सफलतापूर्वक आयोजित की गई।
परोपकार:
परतापुर में गौशाला निर्माण में पूर्ण सहयोग और राजकीय चिकित्सालय में ‘निशुल्क भोजनालय’ का संचालन।
*संस्थागत निष्ठा
: तरुण क्रांति मंच और महावीर इंटरनेशनल के माध्यम से निरंतर सक्रियता।
जनसेवा:
ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यालयों में निरंतर तन-मन-धन से सहयोग और सर्व समाज के साथ मिलकर लोकोपकारी कार्य करना।
तपस्या का शिखर और गुरु सानिध्य
अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज से आपका जुड़ाव 1988 से ही है।प्रथम प्रतिमा: आचार्य श्री सुनील सागर जी के सानिध्य में परतापुर में ली।2️⃣ द्वितीय प्रतिमा: सम्मेद शिखर जी में आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी के ‘557 दिवसीय सिंह निष्क्रीड़ित व्रत’ पारणा के ऐतिहासिक दिन अंगीकार की।
3️⃣ भव्य जैनेश्वरी दीक्षा: वर्ष 2026 में, महावीर जयंती के पश्चात, परतापुर की धरा पर अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज के अतिशय हस्त-कमलों से आप दिगंबर दीक्षा धारण करेंगे।
विशेष उपलब्धियाँ और पुण्य संचय
ज्ञान दान: जिनवाणी प्रकाशन और जीव-दया हेतु निरंतर सक्रियता।
अहोभाग्य:
सिद्धचक्र महामंडल विधान करने, भगवान की प्रतिमा स्थापित करने और आगामी दीक्षा पूर्व ‘भगवान के माता-पिता’ बनने का दुर्लभ सौभाग्य।
दृढ़ संकल्प: राजकीय पद का त्याग कर आत्म-कल्याण की राह पर बढ़ना उनकी प्रबल इच्छाशक्ति का प्रतीक है।
संजय जी का जीवन संदेश देता है कि यदि मन में वैराग्य और समर्पण हो, तो गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी मोक्ष मार्ग की आधारशिला रखी जा सकती है।
>
वागड़ की माटी के भव्य सुपुत्र, जो जैनेश्वरी दीक्षा से समाज, क्षेत्र और परिवार का गौरव बढ़ाएंगे, उनके वैराग्य की अनंत-अनंत अनुमोदना!
शब्द सुमन – शाह मधोक जैन चितरी अनुमोदनकर्ता – श्री साधु सेवा संस्थान राजस्थान से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
