केवल सुनने से कुछ नहीं होता, लेकिन बिना सुने भी कुछ नहीं होता” — आचार्य पुलक सागर महाराज, बोले- लोगों को जगाना ही मेरी ड्यूटी

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केवल सुनने से कुछ नहीं होता, लेकिन बिना सुने भी कुछ नहीं होता” — आचार्य पुलक सागर महाराज, बोले- लोगों को जगाना ही मेरी ड्यूटी
चित्तौड़गढ़ में प्रेस वार्ता के दौरान राष्ट्रीय संत ने दिया मानवता, अहिंसा और वैचारिक परिवर्तन का संदेश; कहा— समाज को बड़ी-बड़ी धार्मिक बातों से ज्यादा इंसानियत की जरूरत
चित्तौड़गढ़।

राष्ट्रीय संत आचार्य 108 पुलक सागर महाराज ने बुधवार शाम आयोजित प्रेस वार्ता में अपने चित्तौड़गढ़ प्रवास, आगामी चातुर्मास और वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों पर खुलकर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि “केवल सुनने से कुछ नहीं होता, लेकिन बिना सुने भी कुछ नहीं होता।” जब तक समाज संतों के विचार और अच्छे संदेश सुनता रहेगा, तब तक देश का भविष्य उज्ज्वल बना रहेगा।
आचार्यश्री ने कहा कि चित्तौड़गढ़ की पावन धरती केवल शौर्य और बलिदान की नहीं, बल्कि भक्त शिरोमणि मीरा की भक्ति और आध्यात्मिक चेतना की भी प्रतीक है। उन्होंने यहां के श्रोताओं की सराहना करते हुए कहा कि चित्तौड़गढ़ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग मजहबी दीवारें तोड़कर एक ही पांडाल में बैठकर प्रवचन सुनते हैं। उन्होंने बताया कि इस बार भीलवाड़ा में चातुर्मास निर्धारित होने के कारण चित्तौड़गढ़ प्रवास का अवसर मिला।

 

आचार्य पुलक सागर महाराज ने कहा कि आज समाज को धर्म की बड़ी-बड़ी बातों से अधिक इंसानियत का पाठ पढ़ाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, “मनुष्य पक्षियों की तरह उड़ना और मछलियों की तरह तैरना तो सीख गया, लेकिन धरती पर इंसान की तरह जीना अभी नहीं सीख पाया। मंदिर और मस्जिद तो बहुत बन गए, लेकिन अपने जीवन को मंदिर नहीं बना पाया।”

 

उन्होंने कहा कि उनका सपना देश में प्रेम के मंदिर और मोहब्बत की मस्जिदें स्थापित करना है, जहां इंसानियत सर्वोच्च मूल्य बने। वर्तमान समय में पूरी दुनिया युद्ध, हिंसा और वैचारिक प्रदूषण के दौर से गुजर रही है। ऐसे समय में भगवान महावीर का अहिंसा, करुणा और दया का संदेश ही मानवता को नई दिशा दे सकता है।

 

आचार्यश्री ने कहा कि वे इस भ्रम में नहीं रहते कि पूरी दुनिया बदल देंगे, लेकिन लोगों को जागृत करना उनका कर्तव्य है। पिछले 32 वर्षों से वे इसी मिशन में निरंतर जुटे हुए हैं। उनका उद्देश्य मजबूत व्यक्ति, मजबूत समाज और मजबूत राष्ट्र का निर्माण करना है। उन्होंने कहा कि वास्तविक वैचारिक परिवर्तन बाहर से नहीं थोपा जा सकता, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने भीतर स्वयं यह परिवर्तन लाना होगा।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

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