मंदिरो मे दर्शन पंचकल्याणक की तरह करो हर बार नई आत्मा लेकर घर लौटो- पुलक सागर

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मंदिरो मे दर्शन पंचकल्याणक की तरह करो हर बार नई आत्मा लेकर घर लौटो- पुलक सागर

निम्बाहेड़ा!

राष्ट्र संत आचार्य  श्री 108पुलक सागर जी महाराज ने कहा कि मंदिर की सीढ़ी चढ़ो तो मन की सीढ़ी चढ़ो मूरत को पूजो तो सूरत को गढ़ो पाप घटाओ, पुण्य बढ़ाओ, जीवन को मढ़ो इंद्र बनके पूजो तो, भव-सागर से तरो!

 

नगर मे बिराजित दिगंबर संत मुनि पुलक सागर ज़ी ने आज दूसरे दिवस अपने प्रवचन श्रखला मे पाप-पुण्य का संयोग – मंदिर दर्शन से आत्मशुद्धि तक विषय पर कहा कि हम लोग आज पुण्योदय से प्राप्त इस मानव भव को सार्थक करने आए है आज का जीव मंदिर जाता है, घंटा बजाता है, माथा टेकता है, पर खाली हाथ लौट आता है। क्यों?हमारा जीवन एक तराजू है। एक पलड़े में पाप, एक में पुण्य। सुबह आंख खुली – पुण्य का उदय। किसी पर क्रोध किया – पाप का बंध। पुण्य से मिली सामग्री को पाप में खर्च कर दो तो नरक, और धर्म में लगाओ तो स्वर्ग-मोक्ष। मंदिर इसलिए जाते हैं कि पाप का पलड़ा हल्का हो, पुण्य का भारी। पर कैसे होगा?

अरे भाई,संगमरमर का टुकड़ा कभी चमत्कारी नहीं होता अगर सुंदरता से चमत्कार होता तो संग्रहालय की हर मूर्ति भगवान हो जाती।चमत्कार होता है धार्मिक अनुष्ठान से।जब तुम स्नान करके, धोती-दुपट्टा पहनकर, मन में पवित्र भाव लाकर, णमोकार मंत्र के साथ अभिषेक करते हो – तब वो पाषाण परमात्मा बनता है मंदिर में जाकर क्या मांगते हो? “भगवान, नौकरी लगवा दो, छोरा पास करवा दो, धंधा चला दो। मंदिरो मे इंद्र बनके पूजा करो इंद्र कैसे करता है? मुकुट पहनकर, रत्नों से थाल सजाकर, “मैं तीन लोक के नाथ की सेवा कर रहा हूं” इस गौरव से। भाव रखो – “प्रभु, आपने तो सब दे दिया, अब मुझे लेने की क्षमता दे दो।”जब इंद्र बनोगे तो लक्ष्मी खुद चलकर आएगी। दरिद्र बनोगे तो मिली हुई भी चली जाएगी।मंदिर पुण्य बढ़ाने की जगह है, मांगने की नहीं पुण्य बढ़ेगा तो पाप अपने आप कटेगा।उदाहरण के तोर पर आचार्य श्री ने कहा की हम तीर्थंकरों के पंचकल्याणक मनाते हैं। तुम जब मंदिर जाओ तो अपनी आत्मा के पंचकल्याणक मनाओ गर्भ कल्याणक मंदिर की सीढ़ी पर पहला कदम रखो तो भाव करो –

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“आज मेरी आत्मा में सम्यक्त्व का गर्भ आया। मिथ्यात्व का अंत हुआ। जन्म कल्याणक भगवान के दर्शन होते ही मन में जन्म हो – “आज मैंने नया जन्म लिया। पुराने पापों को यहीं छोड़ रहा हूं।तप कल्याणक अभिषेक करते समय क्रोध-मान-माया-लोभ का तप करो। केसर-चंदन जल से नहीं, कषायों को धोने से आत्मा चमकेगी। ज्ञान कल्याणक प्रवचन सुनो, शास्त्र पढ़ो।

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ये भाव लाओ कि मेरी आत्मा में केवलज्ञान का प्रकाश हो रहा है। इसी तरह मोक्ष कल्याणक मंदिर से बाहर निकलते समय संकल्प लो “अब मैं संसार से मुंह मोड़कर मोक्ष मार्ग पर चलूंगा।यही आत्म शुद्धि का परिचय है।भगवान के मंदिर पुण्य बढ़ाने और पाप नाश करने की फैक्ट्री है हम मंदिर क्यों जाते हो? दो काम के लिए एक पुण्य का खाता बढ़ाने दर्शन, पूजन, स्वाध्याय, दान, सेवा से दूसरा पाप का खाता खाली करने आलोचना, प्रतिक्रमण, प्रायश्चित, क्षमा से।पर हम उल्टा करते हैं। मंदिर में भी पाप बांध आते हैं – कानाफूसी की, निंदा की, दिखावे की पूजा की, चमड़े का पर्स लेकर गए।याद रखो एक तरफ पुण्य जमा कर रहे हो, दूसरी तरफ पाप की छेद वाली बाल्टी में डाल रहे हो। बाल्टी पहले ठीक करो।खुद को बदलो, दुनिया को बदलने मत जाओ। मंदिर से निकलकर घर में कलह करोगे तो पुण्य वहीं धुल जाएगा!         

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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