*गिरनार जी की स्थायी सुरक्षा: के लिए केवल जन आंदोलन ही नहीं, जन-आधार भी चाहिए।*
जून 2026 के जैन तीर्थ वंदना में प्रकाशित लेख में संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का लगभग 22 वर्ष पूर्व दिया गया एक अत्यंत दूरदर्शी मार्गदर्शन उद्धृत है—”बाहरी दर्शनार्थियों के सहारे गिरनार जी की रक्षा नहीं हो सकती।”
यह कथन केवल एक तीर्थ के संदर्भ में नहीं, बल्कि किसी भी धार्मिक धरोहर की दीर्घकालीन सुरक्षा का सूत्र है। इतिहास बताता है कि जिस क्षेत्र में किसी समाज की स्थायी उपस्थिति, सामाजिक संस्थाएँ, आर्थिक गतिविधियाँ और मतदाता आधार होता है, वहाँ उसके धार्मिक एवं सांस्कृतिक अधिकार अधिक सुरक्षित रहते हैं।


*प्रश्न यह है कि समाधान क्या हो*??? ?
यदि हम सचमुच गिरनार जी की स्थाई सुरक्षा चाहते हैं, तो केवल समय-समय पर विरोध, शासन. प्रशासन ज्ञापन या न्यायालयीन संघर्ष पर्याप्त नहीं होंगे। इसके साथ-साथ एक सकारात्मक, रचनात्मक और दीर्घकालिक योजना भी आवश्यक है।


1. *तलहटी में शैक्षणिक संस्थान*
जैसे प्रतिभास्थली, सांगानेर छात्रावास, अन्य जैन शिक्षण संस्थानों ने सामाजिक आधार निर्मित किया है, वैसे ही गिरनार तलहटी क्षेत्र में भी विद्यालय, छात्रावास, संस्कार केन्द्र और हथकरघा प्रशिक्षण संस्थान स्थापित किए जा सकते हैं।
जब शिक्षक, कर्मचारी और विद्यार्थियों के परिवार वहाँ बसेंगे, तो क्षेत्र में जैन समाज की निरंतर उपस्थिति बनेगी।

2.*स्वरोजगार और उद्योग केन्द्र*
केवल मंदिर और धर्म शालाएं बनाना पर्याप्त नहीं है, लोगों के जीवनयापन के साधन भी चाहिए।
हथकरघा, हस्तशिल्प, गौ-आधारित उद्योग, धार्मिक पर्यटन सेवाएँ तथा अन्य लघु उद्योग स्थापित किए जाएँ तो अनेक परिवार वहाँ स्थायी रूप से रह सकेंगे।
3.*छात्रावास और आवासीय परिसर*
जैन विद्यार्थियों के लिए प्रतियोगी परीक्षा केन्द्र एवं प्रशिक्षण संस्थान विकसित किए जा सकते हैं । इससे नई पीढ़ी का गिरनार से भावनात्मक और व्यावहारिक जुड़ाव बढ़ेगा।
4. *स्थानीय नागरिक भागीदारी*
जो परिवार वर्षों तक वहाँ निवास करेंगे , वे परिवार स्वाभाविक रूप से स्थानीय प्रशासन, नगर व्यवस्था और जनजीवन का हिस्सा बनेंगे। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्थानीय नागरिकों की भागीदारी और मतदाता आधार का महत्व सर्वविदित है।
5. *सेवा और समाजोपयोगी गतिविधियां*
गरीब लोगों के लिए प्राथमिक उपचार हेतु अस्पताल, रक्तदान केन्द्र, पर्यावरण संरक्षण, जल-संरक्षण एवं अन्य लोक हितकारी कार्यों के माध्यम से जैन समाज स्थानीय जनता के साथ आत्मीय संबंध स्थापित कर सकता है। इससे तीर्थ की रक्षा केवल एक समुदाय का नहीं, पूरे क्षेत्र का साझा विषय बन जाएगी।
*आचार्य श्री की दूरदृष्टि*
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का संदेश मूलतः यही प्रतीत होता है कि तीर्थ केवल पूजा से नहीं, उपस्थिति से सुरक्षित होते हैं।
*जहाँ समाज रहता है, वहीं संस्कृति जीवित रह सकती है।*
*जहाँ परिवार बसते हैं, वहीं परम्पराएँ सुरक्षित रहती हैं।*
*और जहाँ स्थायी जन-आधार बनता है, वहीं तीर्थों की रक्षा स्वाभाविक रूप से मजबूत होती है*।
इसलिए गिरनार जी की सुरक्षा के लिए भविष्य की दिशा केवल आंदोलन नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार, निवास और सेवा के माध्यम से एक सशक्त सामाजिक आधार का निर्माण भी हो सकती है। *यही संभवतः उस दूरदर्शी मार्गदर्शन का व्यावहारिक रूप है, जिसकी ओर आचार्य श्री ने वर्षों पहले संकेत किया था*,
लेकिन मुझे लगता है कि आचार्य श्री का संकेत वर्तमान मे उन्हीं के शिष्य मुनिपुंगव निर्यापक श्रमण सुधासागरजी महाराज ही कर सकते हैं, अत: समस्त भारत की जैन समाज को मिलकर अब पूज्यवर सुधासागरजी महाराज से मिलकर उनके मार्गदर्शन व आशीर्वाद से एक दीर्घकालीन योजना पर विचार करना चाहिए।
जयजिनेंद्र 🙏🙏
मनोज बाकलीवाल आगरा
पारस जैन बज अहमदाबाद
दिनाँक : 23.6.2026 से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
