कभी अपने पद, पैसे, समय और किस्मत पर घमंड मत करना, क्योंकि सुबह उनकी भी होती है..जिनके दिन कभी खराब रहे हों..!सब दिन होत न एक समान। अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज
कुणडला मध्य प्रदेश
अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य जीवन में ईर्ष्या, द्वेष और जलन का उत्पन्न होना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन उन भावों को अपने भीतर स्थान देना सबसे बड़ी भूल है। *ईर्ष्या और द्वेष मनुष्य की उन्नति के सबसे बड़े बाधक हैं। जिस प्रकार गंदगी किसी स्थान को दूषित कर देती है, उसी प्रकार ईर्ष्या, द्वेष और कषाय मन को मलिन कर देते हैं।
अक्सर ये दुर्गुण तब प्रकट होते हैं, जब कोई अपना ही उन्नति की ओर बढ़ता है, उसकी पहचान बनती है, उसका सम्मान और लोकप्रियता बढ़ती है। यदि हम दूसरों की सफलता को सहन नहीं कर पाते, तो ये विकार हमारे भीतर घर कर लेते हैं । ऐसे लोग स्वयं भी दु:खी और अशांत रहते हैं। जबकि अपने लोगों की मेहनत, संघर्ष और सफलता देखकर प्रसन्न होना ही सच्ची मानवता और आदर्श जीवन का परिचायक है।

मैं देख रहा हूँ — कई बार व्यक्ति बड़े पद पर पहुँचकर अहंकारवश अपनी स्वतंत्र सोच खो देता है। फिर वह न स्वयं की आँखों से देखता है और न ही अपनी बुद्धि से निर्णय लेता है। कभी-कभी किसी छोटे कर्मचारी या बाबू द्वारा कानों में घोला गया विष ही उसके निर्णय का आधार बन जाता है । यही कारण है कि आज अनेक पदों की गरिमा पर प्रश्नचिह्न लगने लगे हैं और लोगों का विश्वास भी धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।


इसलिए जीवन में उचित-अनुचित का निर्णय सदैव दोनों पक्षों की बात सुनकर, निष्पक्ष बुद्धि और विवेक से करना चाहिए । अन्यथ: एक छोटी-सी भूल अनेक लोगों के लिए भारी पड़ सकती है।

ज़रूरी नहीं कि बीमार होने की वजह केवल बीमारी ही हो; कुछ लोग दूसरों की उन्नति, लोकप्रियता और खुशी देखकर भी बीमार हो जाते हैं…!!!
नरेंद्र अजमेरा पीयूष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
