“शास्त्रों की दिव्य वाणी हमारे जीवन का आधार है” — मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज
गिरीडीह।
हम देव, शास्त्र और गुरु के आराधक हैं यदि आज आगम-वाणी उपलब्ध न होती, तो हमें जीवन की सही दिशा कौन दिखाता? शास्त्र वास्तव में हमारी आत्मा की आँख हैं। बाहरी नेत्र केवल संसार को देखते हैं, जबकि जिनवाणी हमारी अंतरदृष्टि को जागृत कर आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है। उक्त विचार राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाणसागर ने गुणायतन में आयोजित शंका समाधान कार्यक्रम में व्यक्त किए।
गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि प्रातःकाल भगवान का अभिषेक एवं मुनिश्री के मुखारविंद से शांतिधारा संपन्न हुई। इस अवसर पर एक बालक को जैनत्व के संस्कार भी प्रदान किए गए।अपने उद्बोधन में मुनिश्री ने कहा कि शास्त्रों और जिनवाणी के प्रति श्रद्धा, भक्ति और निष्ठा होना आवश्यक है, किंतु केवल पूजा-अर्चना ही शास्त्र-आराधना नहीं है। अनेक लोग देव-शास्त्र-गुरु की पूजा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं, जबकि वास्तविक आराधना तब होती है जब उनके उपदेशों को जीवन में उतारा जाए तथा उनके संरक्षण का दायित्व भी निभाया जाए।

स्वाध्याय के प्रति लोगों की रुचि कम होने पर गुरुदेव ने चिंता व्यक्त की
उन्होंने कहा कि वर्तमान डिजिटल युग में स्वाध्याय के प्रति लोगों की रुचि निरंतर कम होती जा रही है। पहले लोग घंटों प्रवचन सुनते थे और उनमें से अनेक बातें जीवनभर स्मरण रखते थे, किंतु आज रीलों और त्वरित मनोरंजन के दौर में एकाग्रता तथा अध्ययन की प्रवृत्ति कमजोर पड़ रही है। लोग सैकड़ों वीडियो देख लेते हैं, परंतु उनमें से कोई एक संदेश भी स्थायी रूप से याद नहीं रहता। यह स्थिति चिंताजनक है।

मुनिश्री ने कहा कि यदि यही प्रवृत्ति बनी रही तो आने वाले समय में शास्त्र केवल डिजिटल संग्रहों तक सीमित होकर रह जाएंगे और शास्त्र-भंडारों में सुरक्षित जिनवाणी का प्रत्यक्ष स्वरूप लुप्त होने लगेगा। इसलिए आवश्यक है कि समाज सामूहिक रूप से स्वाध्याय की परंपरा को सशक्त बनाए। मंदिरों में नियमित शास्त्र-पठन हो, जिनवाणी को सम्मानपूर्वक एवं व्यवस्थित रूप से सुरक्षित रखा जाए तथा नई पीढ़ी को अध्ययन के लिए प्रेरित किया जाए।


उन्होंने कहा कि केवल श्रुत पंचमी के दिन शास्त्रों की पूजा-अर्चना कर लेने से हमारा दायित्व पूरा नहीं होता। श्रुत पंचमी का वास्तविक उद्देश्य जिनवाणी का अध्ययन, संरक्षण और उसके आदर्शों का जीवन में अनुसरण करना है। जब हम शास्त्रों का अध्ययन कर अपने जीवन को संस्कारित करेंगे, आत्मकल्याण का मार्ग समझेंगे और दूसरों को भी प्रेरित करेंगे, तभी श्रुत पंचमी पर्व का उत्सव सार्थक माना जाएगा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
