संल्लेखना • विदिशा से इंजीनियरिंग, बीना में उद्योग जगत में पहचान, फिर वैराग्य पर चल बने श्रुत सागर महाराज मुंगावली से मोक्षमार्ग तक का सफर; सुभाषचंद्र जैन ने उद्योग, परिवार और समाज का दायित्व निभाकर चुना संयम का पथ

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संल्लेखना • विदिशा से इंजीनियरिंग, बीना में उद्योग जगत में पहचान, फिर वैराग्य पर चल बने श्रुत सागर महाराज मुंगावली से मोक्षमार्ग तक का सफर; सुभाषचंद्र जैन ने उद्योग, परिवार और समाज का दायित्व निभाकर चुना संयम का पथ

 बीना

किसी व्यक्ति का जीवन केवल उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उसके द्वारा चुने गए आदशों से महान बनता है। बीना के प्रतिष्ठित उद्योगपति और समाजसेवी रहे सुभाषचंद्र जैन का जीवन इसी सत्य का उदाहरण है। सांसारिक सफलताओं की ऊंचाइयों को छूने के बाद उन्होंने आध्यात्मिक शिखर की ओर ऐसा कदम बढ़ाया कि अंततः वे मुनिश्री 108श्रुत सागर महाराज के रूप में विख्यात हुए।

 

 

एक परिचय 

सुभाषचंद्र जैन का जन्म 5 सितंबर 1945 को अशोकनगर जिले की धार्मिक नगरी मुंगावली में प्रतिष्ठित जैन परिवार में हुआ। उनके पिता स्वर्गीय माणिकचंद जैन और माता स्वर्गीय प्यारी देवी जैन थे। बचपन से ही मेधावी रहे सुभाषचंद्र ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मुंगावली में प्राप्त की। हायर सेकंडरी परीक्षा में उन्होंने प्रदेश स्तर पर तृतीय स्थान हासिल कर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। इसके बाद उन्होंने विदिशा स्थित सम्राटअशोक प्रौद्योगिकी संस्थान (SATI) से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की।

 

 

 

उच्च शिक्षा के बाद उन्होंने बीना को अपनी कर्मभूमि बनाया। यहां उन्होंने 1968 में अनिल इंडस्ट्री की स्थापना की। उद्योग और व्यापार के क्षेत्र में उन्होंने उल्लेखनीय सफलता अर्जित की। मेहनत, अनुशासन और दूरदर्शिता के बल पर उन्होंने एक सफल औद्योगिक प्रतिष्ठान की स्थापना की और समाज में अपनी अलग पहचान बनाई। उनके व्यक्तित्व की विशेषता यह थी कि आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ सामाजिक और धार्मिक

मूल्यों के प्रति भी उनकी गहरी आस्था बनी रही। 1969 में उनका विवाह चंद्रलेखा जैन से हुआ। उन्होंने पारिवारिक जिम्मेदारियों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया तथा अपने बच्चों को संस्कारयुक्त जीवन दिया।

 

   संयम पथ की और कदम 

 गृहस्थ जीवन में सफलता प्राप्त करने के बावजूद उनके मन में आध्यात्मिक चिंतन निरंतर प्रबल होता गया। 1994 में बीना में आयोजित श्रावक संस्कार शिविर के दौरान उनके भीतर आध्यात्मिकता के बीज अंकुरित हुए। इसके बाद मुनि क्षमा सागर महाराज और अन्य संतों के सानिध्य ने उनके वैराग्य को और अधिक गहरा किया। उन्होंने क्रमशः जैन श्रावक जीवन की विभिन्न प्रतिमाओं और व्रतों को अंगीकार करते हुए संयममय जीवन की ओर कदम बढ़ाए। धर्म, स्वाध्याय, साधना और सेवा को जीवन का आधार बनाकर वे निरंतर आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर रहे। समाज और धर्म के लिए उन्होंने अनेक प्रेरणादायी कार्य किए तथा धार्मिकआयोजनों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। Advertisement for Sudha Amrit mustard oil showing metal tin and assorted bottles (5 L, 2 L, 1 L, 500 ml, 200 ml) with 100% pure claim and contact number 9602091568.

 

 

मुनि दीक्षा 

2019 में महाराष्ट्र के कवठेसार में आचार्य वर्धमान सागर महाराज से उन्हें मुनि दीक्षा प्राप्त हुई। उसी क्षण उद्योगपति और गृहस्थ सुभाषचंद्र जैन का नया आध्यात्मिक जन्म हुआ और वे मुनिश्री 108श्रुतसागर महाराज के नाम से पहचाने जाने लगे। इसके बाद उन्होंने कठोर मुनि चर्या, स्वाध्याय और धर्म प्रभावना के माध्यम से हजारों लोगों को आध्यात्मिक प्रेरणा प्रदान की।

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त्याग की मूर्ति थे मुनिश्री

मुंगावली में जन्में एक प्रतिभाशाली विद्यार्थी, बीना के सफल उद्योगपति और समाजसेवी से लेकर संयम,साधना और त्याग की प्रतिमूर्ति मुनिश्री 108 श्रुतसागर महाराज बनने तक काउनका जीवन यह संदेश देता है कि सांसारिक सफलता औरआध्यात्मिक उत्कर्ष का संगम भी संभव है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा, संस्कार और आत्मोन्नति का एक उज्ज्वल उदाहरण बना रहेगा।

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संल्लेखना के साथ देह का भावपूर्वक विसर्जन

मुनिश्री के बीना निवासी पुत्र सचिन जैन में बताया कि स्वास्थ्य की प्रतिकूलता के कारण मुनिश्री दो-तीन वर्षों से आचार्य संघ से संल्लेखना की अनुमति मांग रहे थे। 2 जून को महाराष्ट्र के सांगली जिले में आने वाले कस्बे डिग्रज में आचार्य श्री 108 सुयश सागर एवं आचार्य श्री 108 धर्मसागर महाराज के समक्ष पुनः संल्लेखना का निवेदन किया। 4 जून को आचार्य परंपरा के आशीर्वाद एवं संघ के निर्णयानुसार यम संलेखना व्रत अंगीकार किया। संल्लेखना काल में पूर्ण संयम, साधना एवं आत्मचिंतन में निरंतर-रत रहे। 13 जून शनिवार को शाम 5:25 बजे आचार्य संघ की सानिध्य में समता भावपूर्वक देह का विसर्जन किया।

                 संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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