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चरित्र ही जीवन की सच्ची शक्ति, जो जैसा है वही सत्य है: मुनि श्री सुधासागर महाराज

धर्म

चरित्र ही जीवन की सच्ची शक्ति, जो जैसा है वही सत्य है: मुनि श्री सुधासागर महाराज
गुना
आचार्य श्री108 विद्यासागर महाराज के परम प्रभावक शिष्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108सुधासागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि केवल ज्ञान प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जीवन में चरित्र का होना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विश्व में दशमलव, अंतरिक्ष विज्ञान सहित अनेक महत्वपूर्ण खोजों का मूल स्रोत भारत रहा है, इसलिए आज भी अनेक देश भारत को विश्वगुरु के रूप में स्वीकार करते हैं।

 

मुनिश्री ने भगवान महावीर स्वामी के ‘अनुभय’ सिद्धांत की व्याख्या करते हुए कहा कि जो जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार करना ही अनुभय है। संसार में कोई वस्तु पूर्ण रूप से अच्छी या बुरी नहीं होती, बल्कि दृष्टिकोण के अनुसार उसका स्वरूप बदलता है। सर्प के विष का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि जो विष मनुष्य के लिए घातक है, वही सर्प के जीवन का आधार है।

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उन्होंने कहा कि अनुभय की दृष्टि से किया गया ध्यान साधक को शुद्ध उपयोग की अवस्था तक पहुंचा देता है। धर्मसभा में मुनिश्री ने नशा और जुए को विनाश का कारण बताते हुए कहा कि मनुष्य सब कुछ जानते हुए भी व्यसनों में फंसकर अपना विवेक खो देता है। उन्होंने महाभारत का उदाहरण देते हुए बताया कि जुए के कारण पांडवों को अपना समृद्ध इंद्रप्रस्थ तक गंवाना पड़ा था।

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मुनिश्री ने कहा कि रावण के पास अपार ज्ञान था, लेकिन चरित्र नहीं था, जबकि भगवान राम का जीवन चरित्र की सर्वोच्च मिसाल है। उन्होंने श्रद्धालुओं से धर्मसभा और भगवान के समक्ष विनम्रता बनाए रखने तथा भारतीय संस्कारों को जीवन में अपनाने का आह्वान किया।

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धर्म सभा में कुर्सी पर बैठने को बताया अनुचित
धर्मसभा के दौरान मुनि श्री सुधासागर महाराज ने कहा कि भगवान और गुरु के समक्ष कुर्सी पर बैठना उचित नहीं माना गया है। उन्होंने कहा कि धर्म में विनम्रता और श्रद्धा का विशेष महत्व है। यदि व्यक्ति अहंकार या सुविधा को प्राथमिकता देता है तो उसकी साधना प्रभावित होती है। मुनिश्री ने कहा कि भारतीय परंपरा में जमीन पर बैठकर पूजा, अध्ययन और भोजन करने की व्यवस्था रही है। इससे शरीर और मन दोनों में संतुलन बना रहता है तथा व्यक्ति में अनुशासन और संस्कार विकसित होते हैं।

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नशा और जुआ जीवन को विनाश की ओर ले जाते हैं

मुनि श्री ने धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को नशा और जुए से दूर रहने की सीख दी। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति जानता है कि नशा विनाश का कारण है, फिर भी लोग इसके जाल में फंस जाते हैं। उन्होंने चिंता जताई कि वर्तमान समय में महिलाएं भी नशे की प्रवृत्ति से प्रभावित हो रही हैं। जुए को महापाप बताते हुए उन्होंने महाभारत का उदाहरण दिया और कहा कि धर्मराज युधिष्ठिर जैसे ज्ञानी पुरुष भी जुए के मोह में अपना राज्य, भाई और पत्नी तक दांव पर लगा बैठे थे। इसलिए व्यसनों से बचना ही सच्चा आत्मकल्याण है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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