भार बनकर नहीं उपहार बनकर जीवन व्यतीत करें तभी नर पर्याय की सार्थकता है। उपाध्याय विकसंत सागर महाराज 

धर्म

भार बनकर नहीं उपहार बनकर जीवन व्यतीत करें तभी नर पर्याय की सार्थकता है। उपाध्याय विकसंत सागर महाराज 

 

निवाई –

सकल दिगम्बर जैन समाज के तत्वावधान में आचार्य श्री 108विनम्र सागर महाराज के शिष्य मुनि श्री विश्वमित सागर महाराज का निवाई से जहाजपुर के लिए मंगल विहार हुआ। मुनि श्री विश्वमित सागर महाराज निवाई में विराजमान उपाध्याय विकसंत सागर महाराज संध से आज्ञा एवं आशीर्वाद लेकर अग्रवाल जैन मंदिर से विहार कर सोहेला, टोंक होते हुए जहाजपुर जाएंगे जहां मुनि श्री भगवान मुनिसुब्रतनाथ जी के दर्शन करके स्वाध्याय एवं साधना करेंगे।

 

 

जैन समाज के प्रवक्ता सुनील भाणजा एवं विमल जौंला ने बताया कि मुनि श्री विश्वमित सागर महाराज जहाजपुर से पद विहार करते हुए निवाई वापस आएंगे। इस अवसर पर उपाध्याय विकसंत सागर महाराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि हम यह मानव पर्याय पाकर पृथ्वी पर भार नहीं उपहार बनें। उन्होंने कहा कि इस जगत में तो सुख और दुःख रुप दो धाराएं अविरल प्रवाहित होती रहती है और मानव सुख और दुःख रुप हिंडोले में झूलता रहता है।

उन्होंने धर्म सभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि जिनके पास न विघा है, न तपस्या करते हैं, न संयम का पालन करते हैं, अपना और अपने बच्चों का पेट भरने, पालन पोषण करने में ही अपना धन व्यय कर देते हैं, दान नहीं देते हैं, ज्ञान प्राप्ति के लिए तत्पर नहीं रहते, शील का पालन नहीं करते, धर्माचरण में लीन नहीं रहते, और सद्गुणों की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील नहीं होते हैं, वें इस मृत्युलोक में पृथ्वी पर भार स्वरूप है, और मनुष्य ही नहीं है, वह तो मनुष्य के रूप में बिना पूंछ और बिना सींग के पशु है। अर्थात उन मनुष्यों और पशुओं में भेद नहीं है। उपाध्याय विकसंत सागर महाराज ने कहा कि संसार में कुछ मनुष्य ऐसे भी होते हैं जो जीवित मुर्दे के समान है, जीते हुए भी मृतक है, और कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो मृत्यु के उपरान्त भी अमरत्व को प्राप्त होते हैं। ऐसे मानवों के नाम इतिहास के पृष्ठों पर अंकित हो जातें हैं उनकी कीर्ति की सुरभि दशों दिशाओं को सुरभित कर देती है। उनकी यश पताका युगों युगों तक लहराती हुई जगती को नवचेतना नया सन्देश सुनाती रहती है अतः इस मानव पर्याय रुप चिंतामणि रत्न को काग उडा़ने में नष्ट न करें और इस पृथ्वी पर जन्मे हैं तो कीट पतंगे तथा पशु पक्षियों जैसे भार बनकर नहीं उपहार बनकर जीवन व्यतीत करें तभी नर पर्याय की सार्थकता है। इस दौरान मुनि आचार सागर महाराज ने भी धर्म सभा को संबोधित किया।

 

जैन समाज के प्रवक्ता सुनील भाणजा एवं विमल जौंला ने बताया कि धर्म सभा से पूर्व श्रद्धालुओं ने भगवान आदिनाथ जी का चित्र अनावरण के साथ दीप प्रज्वलित कर किया गया। एवं गुरु पूजन के साथ मंगलाचरण तथा जिनवाणी स्तुति की गई।

      संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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