मौन जब मुखरित हुआ, तो शब्द उसमें खो गये हैं.. अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज
कुशलगढ़ बांसवाड़ा राजस्थान
अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय पियूष सागरजी महाराज की अहिंसा संस्कार पदयात्रा दिक्षा भुमी परतापुर बांसवाड़ा से पुष्पगिरी के लिए चल रही है उसी श्रुंखला में आज कुशलगढ़ बांसवाड़ा में उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि। और थोड़े क्षम-विलोचन चेतना के हो गये हैं.. मुक्तता संकीर्णता के वर्तुलों से मिल रही है,वास्तविकता के धरातल पर मन प्रसन्न सब हो गये हैं..!
वाणी का वर्चस्व यदि रजत है, तो मौन मणि-कंचन सदृश अमूल्य सुयोग है। अभिव्यक्ति के दो रूप हैं — शाब्दिकता और मौन ।
शाब्दिक शैली, वचन-कला और मधुर भाषिता से हम सबके प्रिय बन जाते हैं किन्तु कई बार जब परिस्थितियों में सामंजस्य नहीं होता, या आचार-विचार भिन्न प्रकृति के होते हैं, तब स्वयं को अभिव्यक्त करने के लिए शब्दों के साथ-साथ मौन भी एक सफल माध्यम बन जाता है।
जब आपके पास कहने के लिए कुछ भी न हो, तब कुछ न कहें।जबरन किसी से बात मत करें, क्योंकि शब्द मूल्यवान होते हैं । बुद्धिमान लोग देखते और सुनते अधिक हैं, बोलते बहुत कम हैं।
एक विवेकपूर्ण चुप्पी, सद्भाव और परोपकार की भावना से युक्त मौन, बिना संवेदना के बोले गये सत्य से कहीं श्रेष्ठ होता है। जब शब्द नहीं बोलते, तब मौन मुखर होकर बोलता है। ध्यान रखना — जो तुम्हारे मौन को नहीं समझ सका, वह तुम्हारे शब्दों को क्या समझेगा-? कहाँ बोलना, क्या बोलना, कब बोलना और किसके सामने बोलना — यह समझ जीवन की महत्वपूर्ण कला है। जैसे कबड्डी का एक सफल खिलाड़ी आगे बढ़ने के साथ-साथ पीछे हटना भी जानता है, वैसे ही बोलने के साथ-साथ कब, कहाँ और कैसे चुप रहना है, इसकी समझ भी आवश्यक है।
आपकी सफलता केवल आपकी योग्यता से नहीं, बल्कि आपकी वाणी, व्यवहार और दृष्टिकोण से तय होती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितने बड़े धनवान, अनुभवी या मेहनती व्यक्ति हैं; यदि आपकी मनोवृत्ति और वाणी-व्यवहार श्रेष्ठ नहीं हैं, तो आपके अवसर भी सीमित हो जायेंगे। इसलिए *शब्द और मौन के बीच यदि हम संतुलन बनाकर चलें, तो जीवन में अधिक दूर तक चल सकेंगे और स्वयं को सफल व सार्थक बना सकेंगे। मधुर वचन बोलने में सरल हो सकते हैं, लेकिन उनकी गूंज लोगों के हृदयों पर वर्षों तक राज करती है…!!!
आज यह अंतर्मना-अहिंसा-संस्कार पदयात्रा{ दिशा- अंद्वेश्वर पार्श्वनाथ, कुशलगढ़, दाहोद, मक्सी पार्श्वनाथ,तपोभूमि उज्जैन,पुष्पगिरी तीर्थ क्षेत्र} परम पूज्य गुरुदेव भारत गोरव विश्व के सर्वश्रेष्ठ तपस्वी उत्तम सिंह निष्क्रिडित व्रत्तकर्ता अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्नसागरजी महाराज जी चतुर्विघ संघ का भव्य मंगल पद विहार दिनाँक 31 मई 2026, रविवार शाम को 5.30 बजे दिगम्बर जेन मंदिर, कलिंजरा, जिला-बाँसवाडा,राजस्थान से श्रीअतिशय क्षेत्र अंदेश्वर पार्श्वनाथजी, तहसील- कुशलगढ, जिला बाँसवाडा राजस्थान 9 किलोमीटर के लिए होगा
नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
