कब तक पूर्व के कमाए पुण्यों को भुनाते रहेंगे श्री मनोज जैन बाकलीवाल आगरा की कलम से
एक विनम्र अपील उन सभी जैन बंधुओं से, जो मंदिर नहीं आते, या अपनी सुविधा के अनुसार देर सवेर आते हैं।हम सब अपने आपको जैन कहते हैं। हमें अपने धर्म, अपनी संस्कृति और अपनी परंपराओं पर गर्व भी है। जब किसी तीर्थंकर की शोभायात्रा निकलती है, किसी आचार्य भगवंत का नगर में आगमन होता है, कोई भव्य विधान, पूजन या धार्मिक आयोजन होता है, तब हम प्रसन्नता से कहते हैं कि “यह हमारा समाज है।”

परंतु कभी स्वयं से यह प्रश्न भी पूछिए कि इस “हमारे समाज” को चलाने वाले लोग कौन हैं?
प्रतिदिन प्रातःकाल मंदिर में अभिषेक, पूजन, स्वाध्याय और आराधना करने वाले वही कुछ समर्पित श्रावक-श्राविकाएँ लगभग प्रत्येक धार्मिक आयोजन की जिम्मेदारी भी निभाते हैं। मुनिराजों के आगमन की व्यवस्था हो, प्रवचन सभा की तैयारी हो, आहारदान की व्यवस्था हो, रथयात्रा का संचालन हो, समाज के कार्यक्रम हों अथवा धर्म प्रभावना के कार्य—हर स्थान पर वही सीमित लोग दिखाई देते हैं।

क्या धर्म और समाज की जिम्मेदारी केवल उन्हीं की है?
यदि भगवान ने हमें स्वस्थ शरीर, समय, साधन और सामर्थ्य दिया है, तो क्या हमारा भी कोई दायित्व नहीं बनता?
हम यह न भूलें कि आज जो सुख-सुविधाएँ, सम्मान, संपन्नता और अनुकूल परिस्थितियाँ हमें प्राप्त हैं, वे केवल वर्तमान पुरुषार्थ का परिणाम नहीं हैं। उनमें हमारे पूर्व जन्मों और पूर्वकाल के पुण्यों का भी बड़ा योगदान है।


परंतु प्रश्न यह है कि कब तक हम केवल पुराने पुण्यों को ही भुनाते रहेंगे?
जिस प्रकार बैंक खाते में जमा धन यदि केवल निकालते रहें और उसमें नया धन जमा न करें, तो एक दिन वह समाप्त हो जाता है। उसी प्रकार पुण्य का भी नियम है। यदि नया पुण्य अर्जित नहीं करेंगे, धर्म आराधना नहीं करेंगे, सेवा और दान में सहभागिता नहीं करेंगे, तो संचित पुण्य भी धीरे-धीरे क्षीण हो जाएंगे।
मंदिर केवल पूजा करने का स्थान नहीं है। मंदिर आत्मा को जागृत करने का केंद्र है। यह वह स्थान है जहाँ से संस्कारों की धारा बहती है। जहाँ बच्चे धर्म सीखते हैं, युवा दिशा पाते हैं और बुजुर्ग आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं।
यदि हम सप्ताह में अनेक घंटे व्यापार, नौकरी, मनोरंजन और सामाजिक कार्यक्रमों को दे सकते हैं, तो क्या भगवान और धर्म के लिए प्रतिदिन कुछ समय नहीं निकाल सकते?
आज आवश्यकता है कि हम केवल दर्शक न बनें, बल्कि सहभागी बनें।
मंदिर आएँ।
अभिषेक-पूजन में भाग लें।
प्रवचन सुनें।
धर्म सभाओं में उपस्थित रहें।
समाज के आयोजनों में सहयोग दें।
मुनिराजों की वैयावृत्ति और सेवा में भागीदार बनें।
अपने बच्चों को भी धर्म से जोड़ें।
याद रखिए, धर्म की शक्ति केवल भवनों से नहीं, बल्कि सक्रिय और जागरूक श्रावकों से बढ़ती है।
आइए, हम संकल्प लें कि अब धर्म और समाज का भार केवल कुछ लोगों के कंधों पर नहीं रहने देंगे। हम भी समय देंगे, श्रम देंगे, तन-मन-धन से सहयोग देंगे और अपने जीवन को धर्ममय बनाने का प्रयास करेंगे।
आज मंदिर की ओर बढ़ाया गया एक कदम, भविष्य के अनंत कल्याण की दिशा में बढ़ाया गया कदम है।
आइए, पूर्व के पुण्यों को केवल भुनाएँ नहीं, नए पुण्यों का भी विशाल भंडार संचित करें। यही सच्ची समझदारी है, यही जैन श्रावक का कर्तव्य है।
“समय रहते धर्म से जुड़ जाइए, क्योंकि जब पुण्य क्षीण होते हैं तो सुविधाएँ भी साथ छोड़ देती हैं, पर धर्म से अर्जित पुण्य और संस्कार आत्मा के साथ चलते हैं।”
मनोज कुमार जैन बांकलीवाल कमलानगर आगरा
