पैसा जीवन निर्वाह का साधन है साध्य नहीं प्रमाण सागर महाराज
इंदौर
पैसा जीवन निर्वाह का साधन है साध्य नहीं” उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने गोम्मटगिरी तीर्थ इंदौर में तीन दिवसीय कार्यक्रम के प्रथम दिन संबोधित करते हुए कहे।
मुनि श्री ने कहा कि हर कोई व्यक्ती प्रगतिशील बनना चाहता है, प्रगति, प्रकृति, पुरुषार्थ और प्रसन्नता पर चर्चा करते हुये कहा कि जब हम जन्मे थे तो मात्र एक फुट के थे और अब पांच छै फुट के जवान हो गये यह शरीर गत प्रगति प्रकृती की है, इसके पश्चात पड़ लिख कर बड़ी बड़ी डिग्रियां हांसिल की यह आपकीबौद्धिक प्रगति है, पहले आपको कोई जानता नहीं था आज पूरे इलाके में आपकी अलग पहचान है, आपने अपने पुरुषार्थ के बल पर काफी ऊचाइयों को प्राप्त किया यह आपकी उपलब्धि है।

मुनि श्री ने कहा कि लेकिन जीवन को प्रगतिशील बनाना चाहते हो तो अपनी सोच को प्रोगेसिव बनाइये अग्रेसिव नहीं दूसरों पर शासन करके आप अग्रेसिव तो बन सकते हो लेकिन प्रोगेसिव नहीं बन सकते प्रोगेसिव बनना चाहते हो तो उस “पेड़” को

देखिये “कितना घना और लम्बा पेड़ होता है,उसकी जड़ें उतनी ही गहरा हुआ करती है,वह शुरुआत से लेकर अंतिम सांस तक अपनी प्रगति करता है, कही कही बार पतझड़ आने के उपरांत भी वह हराभरा बना रहता है, यदि आप भी चाहते हो कि जीवन में हमेशा हरे भरे बने रहो तो आपअपनी सांस्कृतिक निष्ठा को
मजबूत कीजिये, हमारी संस्कृति ही मन की प्रसन्नता है।

मुनि श्री ने कहा कि आपके पास बहुत प्रतिष्ठा है, पावर है, पैसा है,लेकिन यदि मन की प्रसन्नता नहीं है तो वह प्रगति आपकी स्थाई नहीं है, मुनि श्री ने पूछा बताओ आप लोग धन पैसा क्यों जोड़ते हो? जबाब मिला सुख शांति के लिये? तो क्या आपको सुख शांति मिल गयी? उन्होंने उदाहरण देते हुये कहा कि आज से 25 वर्ष पहले इतना पैसा नहीं था जो आज तुम्हारे पास है,

लेकिन शांति तुम्हारे पास जो 25 वर्ष पहले थी वह आज नही है,इसका आशय साफ है कि पैसे में शांति खोजना झूठ है,आपने पैसा कमाया तो शांति के लिये था लेकिन शांति के स्थान पर अशांति आ गई तो यह प्रगति नहीं प्रतिगति है”जीवन के लिये पैसा है पैसे के लिये जीवन नहीं”

उन्होंने फोर्ट कंपनी के संस्थापक का उदाहरण देते हुये कहा कि जीवन में उन्होंने बहुत धन कमाया लेकिन अंत उनका बहुत दुर्दांत हुआ उन्होंने अपनी डायरी में नोट लिखा आज मुझे आभास हो रहा है कि मेंने अपना जीवन पैसा कमाने के स्थान पर यदि मित्र बनाने में लगाया होता मो मेरा अंत इतना दुर्दिन न होता। दूसरा उदाहरण विश्व विजेता सम्राट सिकंदर का दिया जो 27 वर्ष की आयु में विश्व विजेता बना लेकिन जब यूनान से लौट रहा था तो उसके शरीर की हालत खराब हो गयी और उसकी अंतिम इच्छा अपनी मां से मिलने की थी कुछ सांसों के लिये वह अपनी पूरी संपत्ति को लुटाने तैयार था लेकिन वह अपनी मां से नहीं मिल पाया उसने अपने आपको धिक्कारते हुये कहा जिस धन संपदा के पीछे मेंने अपने जीवन की सारी सांसे खपा दी वह मेरे जीवन को चंद मिनट भी नहीं दे पाए उसने कहा “मैं मरुंगा तो मेरा जनाजा उठाओ उस समय मेरे दौनों हाथ जनाजे से बाहर निकाला देना जिससे लोग समझ सकें विश्व विजेता सिकंदर जब गया तो खाली हाथ गया

मुनि श्री ने ये पक्तियों को सुनाते हुये कहा कि”मैं चांहुं भी तो रुक सकता नहीं,भाई मंजिल खुद आगे बढ़ती जाती है में जितना पांव बढ़ाने की कोशिश करता उतनी ही माटी और धसकती जाती है, मेरे अधरों में घुला हलाहल है काला, नयनों में नंगी मौत खड़ी मुस्काती है, है राम नाम ही सत्य असत्य सब और कुछ बस यही ध्वनी कानों से टकराती है..
“जन्म से लेकर मरण तक दौड़ता है आदमी, दौड़ते ही दोड़ते दम तोड़ता है आदमी,
एक रोटी दो लंगोटी तीन गज कच्ची जमीं तीन चीजें जिंदगी में जोड़ता है आदमी
जन्म से लेकर…
सुवह पलना साम अर्थी और खटिया दौपहर, तीन लकड़ी जिंदगी में तोड़ता है आदमी
जन्म से लेकर मरण तक…
है यहा विश्वास कितना? आदमी की मौत पर, मौत के हाथों सब कुछ छोड़ता है आदमी…जन्म से लेकर मरण तक दौड़ता है आदमी…
मुनि श्री ने कहा कि विश्वविजेता सिकंदर को बोध हो गया,धनपति फोर्ट को भी बोध हो गया लेकिन आपको कब होगा? उन्होंने कहा कि पैसा कमाओ लेकिन लेकिन इसके पीछे पागल मत बनो,अपने ऊपर हांवी मत होंने दो, उन्होंने कहा कि अनादि से जो मिथ्यात्व आपके साथ चला आ रहा है वह अधोगति में ले जाएगा उस मिथ्यात्व को तोड़कर भेद विज्ञान को जगाइये और समझीए कि मैं कौन हूं?आत्मा का प्रभाव अनंत है जिस दिन तुम्हे आत्मा का बोध हो जाएगा,वही आपके जीवन की प्रगती होगी।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
