सच्चा ज्ञान वही है, जो स्वयं की सुनता है, स्वयं को समझता है, स्वयं की मानता है और पहले स्वयं वैसा आचरण करता है, फिर दूसरों को उपदेश देता है.. प्रसन्न सागर महाराज
परतापुर बांसवाड़ा राजस्थान
अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि ज्ञान अथाह है, किन्तु यदि तदनुरूप क्रिया विपरीत हो, तो वह ज्ञान ऐसा ही है जैसे गधे की पीठ पर मिश्री का बोरा रखा हो । ज्ञान में अपूर्व शान्ति, मन की प्रसन्नता, गांभीर्य और स्थिरता होती है।
ज्ञान प्रदर्शन का नहीं, आत्मदर्शन का विषय है। ज्ञान आडम्बर नहीं, बल्कि अहसास है। अज्ञान में प्रदर्शन होता है और ज्ञान में सहज आकर्षण होता है। सच्चा ज्ञान प्राप्त होने के बाद जीव कभी निरुद्देश्य भटकता नहीं, जबकि अज्ञानी व्यक्ति भटकते-भटकते अन्तिम समय तक भी सही आश्रय प्राप्त नहीं कर पाता और संसार को केवल ज्ञान देकर विदा हो जाता है।


सच्चा ज्ञान सत्याचरण और आदर्श मार्ग के अनुसरण व अनुकरण की प्रेरणा देता है। शेष सब स्वतः ही नियंत्रित और निर्दिष्ट हो जाता है। इसलिए सच्चा ज्ञान वही है, जिसके समीप जाकर दूसरा पक्ष, व्यक्ति या समाज स्वयं को अकिंचन और असमर्थ अनुभव करने लगे।


ध्यान रखना — ज्ञानी को कभी अपने ज्ञान का तृणमात्र भी दर्प नहीं होता। सच्चा ज्ञान मनुष्य को देवत्व के राजमहल तक पहुँचाने वाला श्रेयस्कर और उत्तम मार्ग है…!!!
नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
