भोग से नहीं, त्याग से मिलता है सच्चा सुख स्वस्तिभूषण माताजी केशवरायपाटन
संतोष ही सबसे बड़ा सुख है, लेकिन यह भोग से नहीं बल्कि त्याग से प्राप्त होता है। यह बात अतिशय क्षेत्र में धर्मसभा में गणिनी आर्यिका 105स्वस्तिभूषण माताजी ने कही।
माताजी ने कहा कि बचपन में हर व्यक्ति सुखी रहता है, क्योंकि उस समय किसी प्रकार की लालसा नहीं होती। जैसे-जैसे जीवन आगे बढ़ता है, आवश्यकताएं और भोग की वस्तुएं बढ़ती जाती हैं और संतोष समाप्त होने लगता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवनभर धन कमाने, परिवार चलाने और बच्चों को पढ़ाने में लगा रहता है, लेकिन इसके बावजूद बुढ़ापे में सुखी नहीं रह पाता। इससे स्पष्ट कि जिस सुख को हम बाहरी वस्तुओं में खोजते हैं, वही आगे चलकर दुख का कारण बन जाता है।


आर्यिका माताजी ने कहा कि स्वर्ग में सुख है, लेकिन वह भी भोग सहित और सीमित है, जबकि मोक्ष में अनंत और भोग रहित सुख प्राप्त होता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे बाजार में कोई वस्तु खरीदते समय उसकी गुणवता देखी जाती है, वैसे ही सुख की गुणवत्ता होती है। उन्होंने कहा भोग भूमि का सुख क्षणिक होता जबकि कर्मभूमि में व्यक्ति परिश्रम करके सुख के साधन जुट पड़ते हैं। जब उन साधनों का उप करने का समय आता है, तब व उम्र बीत जाती है और वही आगे चलकर दुख का कारण जाता है। 

माताजी ने कहा कि सुख वह है जो बाहरी पदार्थों मिलता है और दूसरा सुख आत्मा स्थित है। आत्मा का सुख वास्तविक संतुष्टि देता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
