णमोकार मंत्र धर्म से आत्मा को निर्मल कर श्रद्धा को जागृत कर मोक्ष मार्ग की ओर ले जाता है108 आचार्य श्री वर्धमान सागर जी
जयपुर
आचार्य श्री द्वारा चंद्रपुरी , बड़ के बालाजी की पाठशाला में दिया पूरा पाठ अत्यंत गूढ़ और सारभूत है, जिसमें ॐ, नमस्कार मंत्र, पंच परमेष्ठी, और पंचरंगी ध्वज का अद्भुतआध्यात्मिक रहस्य समझाया गया है।इसे सरल और व्यवस्थित रूप से ऐसे समझाया गया जैसे दूध का मंथन करने पर मक्खन निकलता है,मक्खन को तपाने पर घी प्राप्त होता है,वैसे हीद्वादशांग जिनवाणी का मंथन करने पर उसका सार नमस्कार मंत्र है,और नमस्कार मंत्र का सार “ॐ” है।“ॐ” की रचना कैसे हुई?पंच परमेष्ठी के प्रथम अक्षरों से “ॐ” बना है 1. अरिहंत परमेष्ठी “अ”. सिद्ध परमेष्ठी (अशरीरी) “अ”आचार्य परमेष्ठी “आ” ये तीनों स्वर मिलकर संस्कृत व्याकरण के अनुसार “आ” बनते हैं।उपाध्याय परमेष्ठी “ऊ”“आ” + “ऊ” = “ओ” साधु परमेष्ठी (मुनि) “म्इस प्रकार अ + अ + आ + ऊ + म् = ॐ पंच परमेष्ठी और पंच रंगपंच परमेष्ठियों के साथ पाँच रंगों का भी संबंध बताया गया अरिहंत,नमो अरिहंताणं
श्वेत,सिद्ध नमो सिद्धाणं लाल आचार्य नमो आयरियाणं पीला उपाध्याय नमो उवज्झायाणं हरा साधु नमो लोएसव्वसाहूणं काला / नीला इसी आधार पर जैन पंचरंगी ध्वज बना।अरिहंत का चिंतन चारों ओर श्वेत प्रकाश का भाव ,सिद्धों का चिंतन में लाल आभा का अनुभव ,आचार्यों का चिंतन में पीत वर्ण का ध्यान ,उपाध्यायों का चिंतन मेंहरित रंग का भाव साधुओं के चिंतन में नीले/काले गंभीर रंग का चिंतन करें। यह केवल रंग नहीं, बल्कि आध्यात्मिक भाव-जागरण की साधना है।नमस्कार मंत्र समस्त निर्वाणियों का सार इस लोक और परलोक का सुधारक है।श्रद्धा और विश्वास से जपा जाए तो अद्भुत प्रभाव देता है।* इसमें सांसारिक कामना नहीं, बल्कि आत्म कल्याण का भाव है।मुख्य संदेश नमस्कार मंत्र कोई साधारण शब्द नहीं,यह पंच परमेष्ठियों का वाचक है। समस्त आगम और जिनवाणी का सार है। श्रद्धा, भाव और ध्यान से इसका प्रभाव प्रकट होता है। “नमोकार मंत्र आत्मा को निर्मल करने वाला,श्रद्धा को जागृत करने वालाऔर मोक्षमार्ग की ओर ले जाने वाला महामंत्र है।”
राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
