50 वर्ष पूर्व की स्म्रति आचार्य श्री की जुबानी
कुंडलपुर
विश्व वन्दनीय आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने 50 वर्षो की स्म्रति को बयां किया उन्होंने कहा जब कुडलपुर सिद्धक्षेत्र में जब हमारा प्रथम वर्षायोग हो रहा था तब इस क्षेत्र का स्वरूप क्या था, यह कुछ ही लोगो को ज्ञात है। उन्होंने बताया अनन्त चतुर्दशी के दिन भगवान पर धारा होनी थी, तो कहा गया महाराज श्री को बुलाओ, उस समय धारा की बोली पचास रुपए से प्रारभ होती थी औऱ एक दो रुपए करके सो रुपये के अंदर ही हो जाती थी। तालियों की गड़गहाट हो जाती थी। धीरे धीरे विकास का क्रम प्रारंभ हुआ, बड़े बाबा के बारे में हम समझ रहे है, सोचने लगे है पूर्व में प्रबधंक व मंदिर से जुड़े लोगों ने जीर्णोद्वार का कार्य कराया है। आचार्य श्री ने कहा 40 -50वर्ष की अवधि बहुत इतिहास जैसा लगता है, जब पुण्य बढ़ने लगा विकास बढ़ गया है। यहाँ पहले जो धर्मशालाए थी उनके दरवाजे इतने छोटे थे कि सिर झुकाकर जाते थे।
उन्होंने वर्णन करते कहा बहुत कम लोगॉ का यहां आना जाना होता था,पंचवटी थी, आगंन था, अशोक वृक्ष था, संघ यही विश्राम करता था, आहार के बाद बड़े बाबा के मंदिर में ही तीन समय की सामायिक हुआ करती थी, स्वाध्याय, एकांत ध्यान वही होता था, लोगो को पता ही नही चल पाता था महाराज श्री किस मंदिर में है, लेकिन भक्त लालटेन लेकर आ जाते थे, अब यह सब स्वप्न जैसा जैसा लगता है, बड़े बाबा औऱ छोटे बाबा तो अकेले में जैसे वार्ता करते दिखते थे। वही जब कभी मुसलाधार बरसात हुआ करती थी तो पानी गिरने की ध्वनि, बड़े बाबा व छोटे बाबा के अलावा कोई नही रहता था।
आचार्य ने शब्दो मे बया करते हुए बताया कि अभाना, बांदकपुर, पटेरा, जटाशंकर दमोह की पहाड़ी, बाँसा नदी के किनारे कही दिन बिताए। उन्होनें कहा हटा के लोग कहते है आचार्य श्री हटा आते नही। भाव भीने शब्दो से कहा पहले तो हटा हटता नही, वहा दो शीतकालीन,दो ग्रीष्मकालीन वाचना हुई है।
मन भरा नही आचार्य श्री
आचार्य ने मधुर स्वर से कहा लोग कहते है मन नही भरा,भगवान इनके मन को छोटा करो, तन को भरा जा सकता है मन को नही मन को मनाया करो, उदार होकर कार्य करो।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमडी
