वीतरागता
सुना है एक दिन आचार्य महाराज स्वाध्याय मे लींन थे लोग दर्शन करने आ जा रहे थे सभी चावल चढाते जा रहे थे इतने मे अचानक सभी को चावल चढाते देखकर एक बालक ने अपने हाथ मे रखी चोकलेट चढा दी बालक का भोलापन सभी मुस्कुराने लगे बात आई – गई हो गयी इस घटना से आज भी मन उद्वेलित होता है की यदि हम भी ऐसे वीतरागी गुरु को पाकर बच्चो के समान सरलता सहजता से संसार मे प्रिय मालूम पडने वाली वस्तुओ का त्याग करने के लिये तत्पर हो जाये तो मुक्ति के मार्ग पर चलना. कठिन कहा?
नैनागिरी (1978)
क्षमासागरजी महाराज
आत्मान्वेषी पुस्तक
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी
