Woman in white traditional attire speaking into a microphone on a stage, with an ornate carved chair behind her.

सेवाभाव को अपनाने वाला शांति पाता है: स्वास्तिभूषण माताजी

धर्म

सेवाभाव को अपनाने वाला शांति पाता है: स्वास्तिभूषण माताजी

केशवरायपाटन

पद सेवा के लिए मिलता है, जिसका ईमानदारी से निर्वहन किया जाना चाहिए। पद पर बैठते ही कषाय आना प्रारंभ हो जाता है, लेकिन यदि सेवा भाव से कार्य किया जाए तो पुण्य फल मिलता है, वहीं अभिमान से किया गया कार्य पाप का कारण बनता है।

 

 

 

 

अतिशय क्षेत्र में शुक्रवार को धर्मसभा में स्वस्तिभूषण माताजी ने अपने उदगार में कहा कि अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है, जो व्यक्ति को भीतर से कमजोर कर देता है।व्यक्ति सूट में सीढ़ी चढ़ता एक आधुनिक बिल्डिंग पृष्ठभूमि पर, ऊपर लाल हिंदी हेडलाइन वाला विज्ञापन दिख रहा है; बीच में ग्रे बबल में संदेश और नीचे नमकीन के ट्रे के साथ संपर्क नंबर।Promotional poster for Navin Jain Print Gallery with Buddha statues, devotional pictures, and printing equipment; includes contact numbers and Hindi text.

 

 

 

 

 

 जैसे ही व्यक्ति पद या अधिकार के कारण स्वयं को श्रेष्ठ समझने लगता है, वैसे ही उसके भीतर क्रोध, द्वेष और स्पर्धा जन्म लेने लगते हैं। अहंकार के कारण रिश्ते टूटते हैं और समाज में दूरी बढ़ती है। जो व्यक्ति नम्रता और सेवाभाव को अपनाता है, वही सच्चे अर्थों में सम्मान और शांति प्राप्त करता है।

 

 

 

 

उन्होंने भगवान आदिनाथ के पुत्र भरत चक्रवर्ती का उदाहरण देते हुए

कहा कि वे छः खंडों के अधिपति सम्राट थे, फिर भी वैराग्य लेकर दीक्षा लेने पर उन्हें अंतर मुहूर्त में केवल ज्ञान प्राप्त हुआ। इतना बड़ा साम्राज्य होने के बावजूद उन्होंने कर्म बंधन नहीं होने दिया। माताजी ने कहा कि आज लोग छोटी-छोटी बातों पर क्रोध कर एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं, जिससे कषाय बढ़ता है। भरत चक्रवर्ती ने कहा था कि आत्मा के अलावा उन्हें कुछ दिखाई नहीं देता, वे संसार में कमल की तरह निर्लिप्त रहते हैं। उन्होंने संदेश दिया कि सांसारिक पद यहीं रह जाते हैं, लेकिन उनसे जुड़े कर्म हमारे साथ चलते हैं, इसलिए पद के प्रभाव में आकर कषाय नहीं बांधना चाहिए।

 

      संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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