विवेक और समझदारी के साथ जीवन जीना चाहिए : आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज
शामली।
परम पूज्य वाक्केसरी संत आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि मनुष्य को विवेक, समझदारी और आत्मचिंतन के साथ जीवन जीना चाहिए। शरीर और संसार से जुड़ी बातें समय के साथ विस्मृत हो जाती हैं, किंतु आत्मा का वास्तविक धर्म स्वयं को जानना और अपने शुद्ध स्वरूप की पहचान करना है।

आचार्य श्री ने कहा कि जीव को संसार में आगे बढ़ाने वाले कर्म ही जन्म और मृत्यु के चक्र का कारण बनते हैं। मृत्यु कोई अंत नहीं, बल्कि कर्मों के अनुसार एक अवस्था से दूसरी अवस्था में जाने की प्रक्रिया है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को सदैव यह स्मरण रखना चाहिए कि यह शरीर नश्वर है और एक दिन इसका अंत निश्चित है।
उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य के मन में यह भावना बनी रहे कि “एक दिन मुझे यह संसार छोड़कर जाना है”, तो उसके जीवन की दिशा स्वतः बदल जाती है। तब वह मोह, अहंकार और संग्रह की प्रवृत्तियों से दूर होकर धर्म, संयम और आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर होता है।
मृत्यु-स्मरण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए आचार्य श्री ने कहा कि मृत्यु का स्मरण भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि जीवन को सार्थक बनाने के लिए आवश्यक है। जो व्यक्ति मृत्यु की निश्चितता को समझ लेता है, वह अपने समय का सदुपयोग करता है, श्रेष्ठ कर्म करता है तथा आत्मिक उन्नति के लिए निरंतर प्रयासरत रहता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य का अधिकांश जीवन योजनाएँ बनाने और भविष्य की कल्पनाओं में व्यतीत हो जाता है। वह सोचता रहता है कि आगे यह करूँगा, वह करूँगा, किंतु यह निश्चित नहीं है कि उसे उतना समय प्राप्त भी होगा या नहीं। इसलिए वर्तमान क्षण का सदुपयोग ही जीवन की सबसे बड़ी बुद्धिमानी है।


संसार में कोई भी वस्तु स्थायी नहीं
अपने उद्बोधन में आचार्य श्री ने कहा कि संसार में जो कुछ भी हमें अपना दिखाई देता है—धन, संपत्ति, परिवार, पद और प्रतिष्ठा—वास्तव में इनमें से कोई भी स्थायी नहीं है। मृत्यु के समय सब कुछ यहीं रह जाता है और जीव अकेला ही अपने कर्मों के साथ आगे बढ़ता है।


उन्होंने कहा कि मनुष्य बार-बार यह भूल करता है कि आज जो वस्तुएँ उसके पास हैं, वे सदा उसके साथ रहेंगी। इसी भ्रम के कारण वह मोह और आसक्ति में फँसा रहता है, जबकि सच्चाई यह है कि संसार की कोई भी वस्तु स्थायी नहीं है।
आचार्य श्री ने कहा कि जागरूक व्यक्ति वही है जो समय-समय पर अपने जीवन का मूल्यांकन करता है और स्वयं से पूछता है कि उसका वास्तविक लक्ष्य क्या है। वह समझता है कि शरीर, धन और वैभव सब नश्वर हैं, इसलिए इन पर अत्यधिक अहंकार या आसक्ति उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति इस सत्य को स्वीकार कर लेता है, उसके जीवन में वैराग्य, विवेक और आत्मकल्याण की भावना जागृत होने लगती है। वह धर्म, सदाचार और आत्मचिंतन को महत्व देता है तथा अपने जीवन और समय का सदुपयोग करता है।
आचार्य श्री ने अपने प्रवचन का सार बताते हुए कहा कि हमें केवल शरीर और भौतिक सुखों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि आत्मा के कल्याण, सदाचार, धर्म और आध्यात्मिक उन्नति को भी अपने जीवन का लक्ष्य बनाना चाहिए। यही जीवन की वास्तविक सफलता है।
मुख्य संदेश :
“जो आज अपना प्रतीत हो रहा है, वह सदा साथ नहीं रहेगा; इसलिए मोह में न फँसकर आत्मकल्याण और सद्कर्मों पर ध्यान देना चाहिए।”
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो. 9929747312

