शरीर से सीखो समता का पाठ आर्यिका 105 विज्ञानमति माताजी प्रसंग आर्यिका 105 आदित्यमति माताजी द्वारा आलेखित

धर्म

शरीर से सीखो समता का पाठ आर्यिका 105 विज्ञानमति माताजी प्रसंग आर्यिका 105 आदित्यमति माताजी द्वारा आलेखित

प्रसंग आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के दर्शनार्थ बीनाबारह अतिशय क्षेत्र पहुंचे थे प्रसंग उस समय का है आचार्य भक्ति के उपरांत जब पूज्य आर्यिकाश्री संसघ अपनी वसतिका में आई तभी उनके साथ कुछ त्यागी व्रती आशय ब्रह्मचारिणी बहने व श्रावकगण धर्म कथा सुनने की भावना से आये कभी किसी ने प्रश्न किया पूज्य माताजी क्षमता कैसे रख सकते हैं आशय था समता के संदर्भ में कुछ बताओ तब पूज्य माताजी बोली

 

 

 

 

बहन समता सीखना, समता रखना, समता से सहन करना यह सब हमारे ऊपर निर्भर है। अरे और तो सब बातें बहुत दूर की है हम अपने इस शरीर को देखकर भी समता का पाठ सीख सकते हैं। देखो जरा गौर से इस शरीर को यह शरीर रूपी फैक्ट्री कितनी अच्छी है अर्थात समता वाली है इसमें चाहे सुंदर, सुगंधित स्वादिष्ट इष्ट मधुर पकवान डालो तो भी यह कभी हर्षित नहीं होता है, फूला नहीं समाता है। चाहे इसमें कड़वा, खारा, कषायला, नीरस, तीखा, फीका दुर्गन्धित डालो तो कभी विषाद नहीं करता है, न ही खेद खिन्न होता है। कभी तनाव ग्रस्त नहीं होता है, दोनों में समान बना रहता है। साथ ही यह माल भी एक जैसा ही तैयार करता है। वही सप्त धातुए पकवान हो या रूखी सबसे वही मांस, वही रुधिर, हड्डी, मल मूत्र किसी से किसी भी प्रकार का पक्षपात नहीं करता है। इस प्रकार हम इस शरीर से समता का पाठ सीख सकते हैं।

बहन हम इसमें आत्म बुद्धि रखते हैं सोचते हैं कि यह शरीर मेरा है और मैं इसका हूं ऐसी धारणा बनाकर हम इससे प्रीति करते हैं सो ही वह प्रीति ईति के रूप में अनादि काल से संसार में भटका रही है। इस शरीर से हमें ममत्व छोड़कर इसके बारे में विचार करके आत्म तत्व की तरफ मन लगाना चाहिए। आज तक हमने जो कुछ भी किया है मात्र इस शरीर के लिए ही किया है पर अब इससे कुछ सीखकर अपने लिए करना चाहिए।

सारी बात सुनकर सभी बोल उठे वाह माताजी आपका चिंतन आपकी दृष्टि आपके विचार सुनकर आचार्य भगवान की वाणी याद आती है तभी सुनकर पूज्य माताजी बोली बहन याद नहीं आती वरन यह सब उन्हीं का प्रसाद है उन्हीं के वचनामृत है।

धन्य हो पूज्य माताजी आप हर पल जिनवाणी और गुरु की वाणी को ही कथनी करनी में समाहित करके साधना और उभय प्रभाव न में संलग्न है। हमारा दृष्टिकोण भी आपके जैसे बने। इसी भावना से वन्दामि

आर्यिका 105 आदित्यमति माताजी द्वारा आलेखित पुस्तक संयम साथी से लेख
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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