आप सात समुन्दर लांघ सकते हैं लेकिन..खुद की परछाई को नहीं लांघ सकते..! अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज
पारसोला
सन्मति भवन पारसोला राजस्थान में उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री प्रसन्नसागर महाराज ने कहा कि लाँघने का मतलब है – असंयम और नहीं लाँघने का मतलब है – संयम।
संयम का अर्थ है – अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना
संयम का अर्थ है – बैलेंस बनाकर चलना*।
संयम का अर्थ है – पांचों इन्द्रियों पर अंकुश लगाना*।
स्पर्शन इन्द्रिय का संयम है- शरीर का गलत उपयोग न करना।
रसना इन्द्रिय का संयम है – भोजन में लम्पटता न होना, भोजन करने के बाद भजन में मन लगाना।

घ्राण इन्द्रिय का संयम है- गलत पदार्थ देखकर नाक-मुँह न बिगाड़ना।
चक्षु इन्द्रिय का संयम है – बुरा देखकर भी बुरा न सोचना।
कर्ण इन्द्रिय का संयम है – बुरा सुनने के बाद भी मनस को बुरा नहीं करना।
जैसे –हाथी – कामेन्द्रिय के कारण अपनी जान गंवा देता है,
मछली – आटे की गोली खाने के लिए अपनी जान गंवा देती है,
भौंरा – फूलों की खुशबू में मग्न होकर अपनी जान गंवा देता है,
पतंगा – दीपक की लौ देखकर बावला होकर अपनी जान गंवा देता है,
हिरण – बाँसुरी की धुन सुनने में मस्त होकर अपने प्राण गंवा देता है।
अहो आश्चर्य! एक-एक जीव, केवल एक-एक इन्द्रिय के कारण अपनी जान गंवा देता है। तो जो मनुष्य पांचों इन्द्रियों का दीवाना है, सोचो – उसका क्या हाल होग-???
इसलिए — किसी समस्या के समाधान के लिए थोड़ा संयम रखो, संयम रखने से ही समाधान मिलता है। अतः संयम बनाये रखने के लिए, महापुरूषों के जीवन चरित्र को जरूर पढ़ना चाहिए…!!
। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
