मेरी_गुरु_माँ गुरु माँ Mothers day पर आपके श्री चरणों में आपकी लघु शिष्या का ढेर सारा प्रणाम

धर्म

मेरी_गुरु_माँ
गुरु माँ Mothers day पर आपके श्री चरणों में आपकी लघु  दीदी को शिष्या का ढेर सारा प्रणाम

अदिति दीदी की कलम से

हाँ माँ! ऐसी ही तो हो आप, जो हम शिष्यों से, चाहे कितनी भी बड़ी गलती क्यों न हो जाये, लेकिन फिर भी, बहुत धैर्यता से हमें सुनकर, मीठी टेबलेट देकर बहुत ही प्यार से हमें समझाती हो, और फिर अपनी प्यारी सी मुस्कान से हमें माफ भी कर देती हो।
*हाँ, ऐसी ही तो हैं माँ, जिनके अनुशासन का डंडा ऊपर से भले ही सख्त और कठोर लगता हैं लेकिन निश्चित ही, भीतर से जिनका हृदय मक्खन से भी अधिक कोमल हैं।*
माँ! आप दिखाने के लिए हम शिष्यों से चाहे कितना भी क्यों न रुठ जाओं, लेकिन आपकी मात्र एक झलक ही, हम शिष्यों की हर उलझी गुत्थी का सीधा और सरल समाधान होती हैं।
*जी हाँ! ऐसी ही तो हैं मेरी मार्ग दर्शिका, जो गलती होने पर, दंड बतौर भले ही मौन धारण कर लें, लेकिन जिनकी मौन शैली भी मुखर बन, एक नया पाठ सीखा देती हैं।*
हम जानते हैं माँ, गलती होने पर आप भले ही अपनी दिव्य दृष्टि हम पर से हटा लो, लेकिन आपका मातृत्व, आपकी करुणा दृष्टि, आपका अपार वात्सल्य, अपने शिष्यों की ओर तिरछी नज़र से ही सही, पर देख जरूर लेता हैं , की कहीं मेरा शिष्य किसी दुविधा में तो नहीं हैं। मेरी शिष्या को कोई परेशानी तो नहीं हैं।
*आपकी यही अदृश्य अनुकम्पा ही तो मेरे जीवन जीने का आधार हैं माँ।
सच गुरु माँ!
आपके बिना हर पल खाली हैं, बस आप हो तो हर पल खुशहाली हैं।
_सिद्धान्त की पारगामी, आगम का रसपान तो आप ऐसे कराती हो, जैसे मानों रसगुल्ला ही खिला रहीं हो, मन करता हैं आपके मधुर शब्दों को बस सुनते ही जाए, और जब पुद्गल के रसगुल्लों की बात आती हैं तो मानों अक्षीण महानस सी प्रतीति होती हैं।_*
जी हाँ,
ऐसी ही तो हैं मेरी आदर्श, मेरी प्राणाधार, मेरा मान, मेरा सम्मान, मेरा सर्वस्व, मेरी गुरु माँ! जिनके हर शब्द शब्द में श्रुत का सार गर्भित हैं, जिनके हर अक्षर अक्षर में जिनवाणी की एक सीख समाहित हैं, जिनके आचरण से निर्दोष रत्नत्रय की चकाचोंध परिलक्षित होती हैं, जिनके तेजस्वी मुखमण्डल से नव उमंग, अदम्य उत्साह और ऊर्जा की अजस्र धारा प्रवाहित होती हैं, जिनके ओजस्वी आभामण्डल से जनसामान्य बरबस खिंचे चले आते हैं, जिनकी मिश्री सी मीठी वाणी, प्राणी मात्र के दिलों पर राज करती हैं। सबसे प्यारी, सबसे न्यारी, सबकी चहेती, अभिक्ष्ण ज्ञानोपयोगी, ऐसी ही तो हैं फूलों सी कोमल लेकिन मोक्ष पथ की सुदृढ़ राही, मेरी गुरु माँ परम् पूज्या पट्ट गणिनी आर्यिका रत्न 105 श्री विज्ञमति माताजी

माँ विज्ञ चरण चंचरीक-*
आपकी लघु शिष्या
वन्दामि
गुरु
माँ

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *