रक्षाबंधन केवल पर्व नहीं, आत्मीयता और धर्मसंरक्षण का संकल्प है : मुनि श्री प्रमाण सागर
सोलह कारण भावनाओं को केवल धार्मिक क्रिया नहीं, जीवन का भाव बनाएं
गिरिडीह (मधुबन)।
भारतीय संस्कृति के प्रत्येक पर्व में कोई न कोई श्रेष्ठ संदेश और जीवन-मूल्य छिपा होता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम पर्वों को केवल परंपरा और औपचारिकता के रूप में न मनाएं, बल्कि उनके पीछे छिपे आध्यात्मिक संदेश को समझकर अपने जीवन में उतारें। रक्षाबंधन का पर्व भी आत्मीयता, विश्वास, धर्मसंरक्षण और पारिवारिक मूल्यों को सुदृढ़ करने की प्रेरणा देता है।
यह विचार राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने गुणायतन परिसर में आयोजित प्रातःकालीन प्रवचन सभा में देशभर से जुड़े श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता पर्वों की वास्तविक भावना को समझने और उन्हें जीवन में उतारने की है। जब पर्व केवल औपचारिकता बन जाते हैं, तब उनका वास्तविक उद्देश्य कहीं पीछे छूट जाता है।
धर्म केवल क्रिया नहीं, भावशुद्धि का माध्यम
मुनि श्री ने कहा कि धार्मिक पर्व केवल पूजा-पाठ, व्रत और अनुष्ठानों तक सीमित नहीं हैं। ये आत्मचिंतन, भावशुद्धि और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने के अवसर हैं। यदि व्यक्ति धार्मिक क्रियाओं के साथ अपने भीतर के राग-द्वेष, क्रोध, अहंकार और स्वार्थ को भी कम करने का प्रयास करे, तभी धर्म का वास्तविक प्रभाव जीवन में दिखाई देगा।
उन्होंने कहा कि मंदिर जाना, पूजा करना, व्रत रखना अथवा धार्मिक अनुष्ठान करना तभी सार्थक है, जब उसके पीछे शुद्ध और निर्मल भाव जुड़े हों। केवल बाहरी रूप से धर्म का पालन करने से आत्मपरिवर्तन संभव नहीं है। धर्म का उद्देश्य केवल बाहरी जीवन को व्यवस्थित करना नहीं, बल्कि अंतर्मन को निर्मल और व्यक्तित्व को श्रेष्ठ बनाना है।
सोलह कारण भावनाएं जीवन में उतारने का अवसर
मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि सोलह कारण भावनाओं का वास्तविक संदेश व्यक्ति को अपने जीवन की दिशा श्रेष्ठ बनाने के लिए प्रेरित करना है। इन भावनाओं का चिंतन करते समय प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि जिन गुणों और आदर्शों का वह चिंतन कर रहा है, क्या वे उसके व्यवहार और जीवनचर्या में भी दिखाई दे रहे हैं?
यदि धार्मिक पर्व समाप्त होने के बाद भी हमारे विचार, व्यवहार और जीवनशैली पहले जैसी ही बनी रहे, तो हमें स्वयं के भीतर झांकने की आवश्यकता है। सोलह कारण भावनाएं केवल धार्मिक पाठ अथवा परंपरा नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और जीवन को श्रेष्ठ बनाने की महत्वपूर्ण प्रक्रिया हैं।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि सोलह कारण भावनाओं को केवल क्रिया के रूप में न मनाएं, बल्कि उनके श्रेष्ठ भावों को अपने आचरण का हिस्सा बनाएं। यही धार्मिक पर्वों की वास्तविक सार्थकता होगी।
28 अगस्त को वृहद शांतिधारा, 29 से विशेष प्रवचन
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि 28 अगस्त, शुक्रवार, पूर्णिमा के अवसर पर प्रातः 8 बजे मुनि श्री के मुखारविंद से ऋद्धि मंत्रों के साथ 55 मिनट की वृहद शांतिधारा संपन्न होगी। इसके पश्चात रक्षाबंधन महापर्व के आध्यात्मिक महत्व पर विशेष प्रकाश डाला जाएगा।
उन्होंने बताया कि 29 अगस्त से सोलह कारण भावनाओं पर प्रतिदिन प्रातः 8:30 बजे से विशेष प्रवचन होंगे। इन प्रवचनों में सोलह कारण भावनाओं के आध्यात्मिक, दार्शनिक एवं व्यावहारिक पक्षों पर विस्तार से प्रकाश डाला जाएगा।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो.: 9929747312





