अन्तर्मना लफ्ज़ कम है, पर श्रद्धा भक्ति विश्वास से भरे हैं.. हे गुरूदेव!प्रीत की है रीत सच्ची हम तुम्हारे-तुम हमारे..!

धर्म

अन्तर्मना लफ्ज़ कम है, पर श्रद्धा भक्ति विश्वास से भरे हैं.. हे गुरूदेव!प्रीत की है रीत सच्ची हम तुम्हारे-तुम हमारे..!

 

हे अनेक क्षमताओं के समवाय दैदीप्यमान गुरूदेव –* आपकी तपस्विता के उषय ने जन-जन के अंतःकरण में उनके प्रति श्रद्धा के समंदर की उत्ताल तरंगों को उछाल दी है। आचार्य श्री को निकटता से देखने परखने वाले अच्छी तरह जानते हैं, कि उनकी मनोवृत्ति कितनी उदात्त थी। उनका वाणी संयम कितना विलक्षण था, और उनके कार्य कितने परोपकार पारायण थे, उनके निकट पहुंचते ही दर्शक सम्मोहित हो जाते थे, निर्निमेष उन्हें निहारते रहते थे।

 

 

हे श्रमण कुल तिलक गुरूदेव — आप वाह्य और अंतरंग दोनों प्रकार के व्यक्तित्व के सौरभ से श्री संपन्न थे। उनका वाह्य व्यक्तित्व, उनकी आकृति पर अभिमंत्रित था ललाट, आंखें, भोह, पलकें, कान, नासिका, ओष्टपोस्ट आदि अवयवों के योग से, बाल सुलभ सर्वांग सौंदर्य का वे वरण करते थे। अनुपमेय व्यक्तित्व और कृतित्व से अभि-मण्डित उनकी आकृति, शोभा-शालीनता के संग सुंदर तो थी ही, उससे भी सुंदर था उनका वैरागी अंतः प्रवृत्ति – प्रकृति – स्वभाव।

हे मूलाचार-समयसार के राज हंस गुरूदेव — आप में समा गई चांद सी शीतल चांदनी, सूर्य सा प्रखर तेज, तारों की सी झिलमिलाहट और सागर सी गंभीरता, धरणी सा गजब का धैर्य, आपकी ऋतंभर प्रज्ञा को अनंत विस्तार देता था। जिसके प्रभाव से आप सदा निर्विचार स्थिति में रहने की साधना कर आत्मानंद की अप्रतिम अनुभूति करते रहते थे।

हे कर्मजा शक्ति के प्रतीक-सन्त शिरोमणी गुरूदेव –* आपके पास चरित्र की निर्मलता, साधना की तेजस्विता, भावों की पवित्रता तथा विचारों की एक रूपता स्वाभाविक रूप से विन्यस्त हुई थी। जीवन को इन पवित्र गुणों द्वारा उर्ध्वगामी बनाने की कला के आप अप्रतिम साधक थे। हर पल जागरूकता से चेतन को जागृत बनाए रखकर अप्रमत्त जीवन जीते हुए अपने अनुगामियों को भी अप्रमत रहने का पाठ पढ़ाते हुए, उनके उत्तरोत्तर विकास का मार्ग प्रशस्त करते रहते थे, ऐसे भुवन भास्कर आचार्य श्री विद्यासागर जी महा मुनिराज।

 

हे जाग्रत मेघा के धनी गुरूदेव — आप एक ऐसे दिव्य सन्त थे, जिनका आधार जिनवाणी, जिनका आचार था वीतराग की दिशा में निरंतर गतिशीलता, रत्नत्रय की आराधना जिनकी विचार थी, सत्य की अप्रतिम उपासना जिनका व्यवहार था, मृदु – करूणाशील, विनम्र, प्रशांत व सारणा – वारणायुक्त और जिनका स्वाभाविक स्वभाव था समय प्रबंधन। अत्यंत सामान्य किन्तु प्रभावशाली और वात्सल्य से परिपूर्ण शब्दों में गुम्फित उनका शंखनाद जन जन के अंतस्तल में उत्कीर्णित हो जाता था, और उनके प्रबोधन को आत्मसात कर, जीवन को धन्य बना लेने की प्रवृत्ति अत्यंत सहजता के संग अद्भुत हो जाती थी। उन्होंने आव्हान किया है हर मनुष्य का – कि वह जीवन में प्रतिस्पर्धा नहीं सहयोग की वृद्धि को अंगीकृत, तनाव नहीं पाले – प्रत्युत परस्पर प्रेम और सदभाव मैत्री के साथ सह-जीवन का अभ्यास करे, विचारों की संकीर्णता से नहीं, समरसता से समाधान करे। स्वयं के अहम को नहीं, बल्कि राष्ट्र को अर्हम बनने की दिशा प्रदान करे। हृदयहीनता नहीं – संवेदनशीलता का अभ्यासी बने – और बने आत्म चिंतन – परमात्म चिन्तन के अभ्यासी,, द्रव्य पूजन के संग, भाव पूजन के शुभमय सहयोग से चेतना का ऊर्ध्वारोहण करे।

 

अनन्त शुभसंशाओ सहितणमो आयरियाणं अन्तर्मना आचार्य प्रसन्न सागर18 फरवरी 2026

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *