_नि:कांक्षित अंगी*_
आचार्य श्रीजी का जीवन इहलौकिक व पारलौकिक सभी प्रकार की आकांक्षाओं से रहित है। सर्व वैभव संपन्न राजनेता एवं श्रेष्ठी वर्ग उनके चरणों में अपना वैभव समर्पित करने तैयार खड़े रहते हैं । देवता तक उनके चरणों में सर झुकाए, प्रार्थना मुद्रा में, आदेश कीजिए भाव से खड़े रहते हैं। ऐसे आचार्य भगवन् किसी से भी तिल-तुष मात्र भी आशा, अपेक्षा एवं आकांक्षा नहीं रखते हैं ।
२६ दिसंबर, २००५, सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर, दमोह, म.प्र. का एक प्रसंग है। बड़े बाबाजी को उच्चासन पर विराजमान किया जाना था। अनेक बाधाएँ सामने थीं। यह कार्य सफलता पूर्वक सानंद संपन्न हो, ऐसी भावना सभी शिष्य एवं गुरु-भक्त श्रावकों के मन में चल रही थी। गुरुजी से चर्चा ही चर्चा में टीकमगढ़ से आई ब्रह्मचारिणी बहिन अनीता दीदी ने कहा- ‘गुरुवर! बड़े बाबा को उच्चासन देने में आ रही प्रतिकूल परिस्थितियों को देखकर मन बैचेन-सा हो जाता है। ऐसा लगता है कि आँख बंद करके खोलूँ तो भगवान फूल की तरह उठकर उच्चासन पर विराजित दिखें।

गुरुवर मुस्कुरा रहे थे, और वह बहिन हल्का-सा हँसती हुई, धीमे से बोली- “गुरुवर! हमारे दादागुरुजी से कहिए न, वह ऐसा ही कुछ करिश्मा कर दें।’ दादा गुरु तो उपलक्षणभूत थे। उसका कहना यह था कि आपके चरणों में आने वाले देवगणों को आप आदेश दीजिए कि वह बड़े बाबा को फूल-सा उठाकर उच्चासन पर विराजमान कर दें। इतना सुनकर गुरुवर ने- ‘धम्मो मंगल मुद्दिद्वं, अहिंसा संयमो तवो। देवा वि तस्स पणमंति, जस्स धम्मे सया मणो’, गाथा कही, और इस गाथा को कह कर वह बोले- ‘मैं आदेश नहीं देता।असंयमियों को मैं आदेश क्यों दूं? वह अपना कर्त्तव्य करें।मैं क्यों बोलूँ।’

आचार्यश्रीजी ने जो ऊपर गाथा कही थी उसका अर्थ था- जिनके पास अहिंसा, संयम एवं तप होता है, देवता स्वयं उनके समक्ष प्रणत होते हैं। इससे स्पष्ट हो रहा है कि उन्हें अपने सम्यक्त्व पर पूरा विश्वास है। क्योंकि संयम एवं तप जब सम्यक्त्व के साथ होंगे,तभी तो देवों द्वारा पूजे जाएँगे। 


‘संयमी होकर असंयमी को आज्ञा क्यों दूँ’, गुरुवर का यह कथन संयम के प्रति उनकी हर पल सजगता का द्योतक है। ‘मैं क्यों कहूँ वह अपना कर्त्तव्य स्वयं समझें, यह कथन गुरुवर की अत्यंत निःकांक्षित भावना को प्रदर्शित कर रहा है।
बड़े बाबा को उच्चासन पर विराजमान करने की तीव्र अभिलाषा आचार्यश्रीजी की स्वयं की थी। इसमें आने वाले व्यवधान उन्हें प्रत्यक्ष दिख रहे थे। फिर भी चर्चा-चर्चा में भी उनके मुख से यह नहीं निकला कि हाँ, देवगण यह कार्य करें। निःकांक्षित अंग के धनी आचार्य भगवन्! आप धन्य हैं!
