निर्यापक श्रमण मुनिश्री 108 सुधासागर महाराज से जुड़ा संस्मरण एक महान संत की अमर गौरव गाथा मोतीझरा का प्रकोप
महापुरुषों का जीवन बहुत ही संघर्षमय होता है।बचपन से ही उनके जीवन में अनेक बाधाएं आने लगती है।लेकिन वो हर परिस्थिति का सामना करते हुए अपनी मंजिल की ओर निरन्तर बढ़ते जाते है।प्रस्तुत है-जयकुमार के बचपन का एक प्रसंग
मध्यमवर्गीय कृषक श्री रूपचन्द्र जी के यहां वह होनहार बालक जयकुमार दिनोंदिन वृद्धिंगत हो रहा था,तभी उसे असाताकर्म ने आ घेरा।तीन वर्ष के जय खेल रहे थे आंगन में।चेहरा उतर गया था-उस दिन।मां ने देखा तो घबरा गई,दौड़कर उठाया गोद में-आश्चर्य में पड़ गई।तेज़ बुखार था उसे।पहले जय के उपचार के लिये घर की दवाई चली दिन भर।दूसरे दिन वैद्य को बुलाया गया।तीन दिन उनकी दवा चली।चौथे दिन ग्राम के डॉक्टर साब अपने घर पर थे,उन्हें जय के पास लाया गया।डॉ.साब ने देखा और समझते देर न लगी,बोले- यह तो तीव्र मोतीझरा के घेरे में आ गया है।इसकी दवा एक महीने तक चलेगी।






जैसा देश,वैसा भेष ईसुरवारा एक भारतीय गांव है।अतः गांव में जो कार्य जैसा चलता है,उसे आगे भी वैसा चलाया जाता है।जय की दवा पहले घर के सदस्यों ने की,फिर वैद्य ने और फिर डॉक्टर से,पर वह पूरी कहाँ?जब तक गांव के चाहने वाले जन अपने मन की झाड़-फूंक न करा लें।पड़ोस की एक दादी माँ गांव के एक झरइया जी(झाड़-फूंक करने वाले) को ले आयी,वे सब प्रकार के रोग झारते थे।उन्हें देखकर और दादी माँ का प्यार देखकर जैन धर्म के उपासक रूपचन्द्र जी और शांतिदेवी जी ने-दादी की सुकोमल भावनाओ को ठेस न पहुँच सके,इसलिये झरवाने के लिये तैयार हो गए। फलत:झरइया जी झार कर चले गए।उनका क्रम एक दो सप्ताह चला।
तीव्र कमजोरी और बेहतर परहेज के संयोग बने रहे माह भर।धीरे-धीरे जय के स्वास्थ्य में सुधार आ गया।तबीयत ठीक होते ही वहां के वैद्य प्रसन्न,यहां डॉक्टर प्रसन्न और बीच मे झरइया जी प्रसन्न।
समय बीतता गया।जब चार वर्ष की उम्र हुई तो पुनः मोतीझरा ने आ घेरा।तन की कमजोरी बढ़ती गई, किन्तु मन निर्मल रहा।कुछ दिन आराम करने के बाद तबीयत में सुधार आ गया।
ऐसी अनेक बाधाओं को पार करने वाले जयकुमार का नाम,वर्तमान के श्रेष्ठ साधकों की श्रेणी में अंकित है।
सुधा का सागर से साभार
लेखक- सुरेश चंद्र जैन ‘सरल’
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

