महावीर जिनालय में हुई मुनि श्री दुर्लभ सागर की प्रथम धर्म देशना आत्मा से जानने वाली वस्तु को इंद्रियों से नहीं जाना जा सकता है* मुनि श्री दुर्लभ सागर

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महावीर जिनालय में हुई मुनि श्री दुर्लभ सागर की प्रथम धर्म देशना आत्मा से जानने वाली वस्तु को इंद्रियों से नहीं जाना जा सकता है* मुनि श्री दुर्लभ सागर

आरोन-

विगत पांच माह से आरोन नगर में बर्षायोग हेतु विराजमान वात्सल्य मूर्ति बीजाक्षर प्रणेता मुनि श्री दुर्लभ सागर जी महाराज की महावीर जिनालय में प्रथम धर्म देशना हुई। विगत दिवस मुमुक्षु मंडल महावीर जिनालय कमेटी द्वारा मुनि श्री दुर्लभ सागर जी महाराज ससंघ से महावीर जिनालय में मंगल प्रवचन करने का आग्रह किया था। जिसके पश्चात् मुनि श्री दुर्लभ सागर जी महाराज ने महावीर जिनालय में अपने मंगल आशीर्वचनों को देने की स्वीकृति प्रदान की थी।

 

 

 

 

चातुर्मास कमेटी के प्रचार मंत्री सुनील झंडा ने जानकारी देते हुए बताया कि दोपहर में मुनि श्री को बड़ा जैन मन्दिर से दिव्य घोष के साथ जुलुश के रूप में कार्यक्रम स्थल महावीर जिनालय ले जाया गया। सुज्ञान जागृति पाठशाला के बच्चे, बहिनें,सेवा दल,समितियों के सदस्य एवं जैन समाज कमेटी के अध्यक्ष विजय डोडिया एवं ट्रस्ट कमेटी के सभी पदाधिकारी,सदस्यगण व समाज जन इस जुलूस में शामिल हुए। महावीर जिनालय पर मुमुक्षु मंडल के अध्यक्ष अशोक जैन महोटी, अमन जैन शास्त्री,कैलाश जैन खिरिया,प्रकाशचंद भगवन्तपुर,सुरेश जैन खिरिया,गुलाबचंद भगवंतपुर, कपूरचंद उनारसी,डिंपी जैन ने मुनि श्री दुर्लभ सागर जी महाराज एवं पूज्य क्षुल्लक श्री निर्धूम सागर जी महाराज के पाद प्रक्षालन कर मुनि श्री की मंगल आगवानी की एवं मुनि श्री से अपनी ज्ञानमयी वाणी से लाभान्वित करने का निवेदन किया। इस अवसर पर मुनि श्री दुर्लभ सागर जी महाराज ने आचार्य कुंदकुंद स्वामी द्वारा लिखित समयसार ग्रंथ पर अपनी धर्मोपदेशना देते हुए कहाकि शुद्धोपयोग का रस चखने के लिए समयसार ग्रंथ का अपना एक महत्व है। जो बस्तु आत्मा से जानी जाती है उसे इंद्रियों से नहीं जाना जा सकता है। क्योंकि आत्मानुभूति को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है। मुनि श्री ने कहाकि समयसार एक समाधान ग्रंथ है और इसकी 13 से 14 गाथाओं से भी बहुत कुछ जाना जा सकता है। मुनि श्री ने चार पुरुषार्थों में काम पुरुषार्थ के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहाकि यदि न्याय और नीति पूर्वक संतानोत्पत्ति की जाए तो वह काम भी पुरुषार्थ है। उन्होंने भोग के संदर्भ अपनी बात को विस्तार देते हुए कहाकि भोग शहद में लिपटी हुई तलवार के समान है। शहद में लिपटी हुई तलवार को को चाटोगे तो शुरू में कुछ पलों के लिए तो शहद का स्वाद आनंद देता है लेकिन जिव्हा के कटने पर और लहू निकलने पर दर्द की अनुभूति होती है तब आपको काम में भी दुख का अनुभव होगा। मुनि श्री ने बताया कि कामान्ध हाथी भी अपने से कमजोर व्यक्ति के अंकुश में आकार नियंत्रित हो जाता है अतः काम वासना से बचें। धर्म सभा में सैकड़ों श्रावक श्राविका उपस्थित थे।

  *सुनील जैन झंडा आरोन*

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