निर्मल चित्त के धारक मनुष्य का प्रत्येक कार्य भगवान के वचनानुसार होता है धर्म चक्रवर्ती जयकीर्तिजी गुरुदेव

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निर्मल चित्त के धारक मनुष्य का प्रत्येक कार्य भगवान के वचनानुसार होता है धर्म चक्रवर्ती जयकीर्तिजी गुरुदेव

कोटा राजस्थान
ध्यान दिवाकर अनुष्ठान विशेषज्ञ धर्म चक्रवर्ती जयकीर्तिजी गुरुदेव रामपुरा स्थित श्री दिंगबर जैन मंदिर में राजस्थान में विराजमान है ।राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी पारस जैन “पार्श्वमणि” ने बताया कि पद्म पुराण पर आधारित श्री राम कथा का भाव पूर्ण संगीत की सुमधुर धुनों के साथ21 नवम्बर से 30 नवम्बर तक रामपुरा स्थित अकलंक स्कूल परिसर में सैकड़ों श्रद्धालुओं की गरिमामई उपस्थिति में पहली बार किया जा रहा है।

 

 

 

अकलंक संस्था के अध्यक्ष पीयूष बज एवं महेश जैन गंगवाल ने बताया कि आज सर्व प्रथममां जिनवाणी को पालकी में रख कर श्री लादूलाल, लाड़बाई, पदम मिनल, संयोग अजमेर परिवारजन ने गुरुदेव के कर कमलों में भेट की।इसके बाद राजा श्रेणिक बनने का सौभाग्य श्री संजय श्रीमती विनोद संकेत, सलोनी यश जैन परिवारजन ने प्राप्त किया।

 

महेश जैन गंगवाल ने बताया कि
विशिष्ट राम कथाकार अनुष्टान विशेषज्ञ ध्यान दिवाकर धर्म चक्रवर्ती जयकीर्ति गुरुदेव ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि सीता के प्रेम में व्याकुल रावण को संतुष्ट करने के अभिप्राय से मंडोदरी द्वारा सीता को रावण का प्रेम प्रस्थाव स्वीकार ने हेतु आग्रह… सीता द्वारा मंडोदरी को धिक्कारते हुए कहना कि कुशील मनुष्यों की संपदाएं भी मल के समान है एवं सुशील मनुष्यों की दरिद्रता भी आभुषण हैं… सीता के नहीं मानने पर रावण ने उसे अनेक प्रकार से भयभीत किया फिर भी पतिव्रता सीता भयभीत नहीं हुई… विभीषण एवं सीता का संवाद… विभीषण एवं मारीच मंत्री द्वारा रावण को सीता को मुक्त करने हेतु समझाना… रावण द्वारा सात वनों से घिरे प्रमद वन मे शोक साहित सीता को अशोक वृक्ष के नीचे बिठाना… सेविकाओं द्वारा सीता को अनेक प्रकार से मनाने पर भी सीता अटल रही जिससे रावण का चिंता मग्न हो विचित्र चेष्टायुक्त होना ..
इधर सुग्रीव एवं राम लक्ष्मण का संवाद… बालि मुनिराज के दीक्षा लेने का रहस्य.. दशानन का रावण नामकरण का रहस्य.. रावण का पश्चाताप एवं बालि मुनी से क्षमा याचना.. रावण द्वारा कैलाश पर्वत के जिनालय में जिनभक्ति से प्रसन्न हो धरणेन्द्र का आना एवं रावण से वर मांगने हेतु कहना.. रावण ने धरणेन्द्र से कहा कि जिनेन्द्र वन्दना के समान संसार में अन्य कोई वस्तु नहीं.. रावण के मना करने के बाद भी धरणेन्द्र ने अमोघ विजया नामक विद्या दी.. राम लक्ष्मण के संयोग से सुग्रीव को स्व राज्य, स्त्री, एवं पुत्र की पुनः प्राप्त होना.. सुग्रीव द्वारा सीता की खोज करना.. मार्ग में रत्नजटि विधाधर से रावण द्वारा सीता हरण की सूचना मिलना.. सुग्रीव द्वारा सीता का समाचार सुन राम लक्ष्मण का प्रसन्न होना.. दूत के रूप में रावण के पास भेजने के लिए हनुमान का चयन करना.. वानरवंशियों पर उपकार करने के लिए हनुमान द्वारा राम लक्ष्मण के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना.. लंका जाने के मार्ग में हनुमान को अपनी माँ सति अंजना के कष्टों का स्मरण होना.. आदि अनेकानेक विषयों का लालित्य पूर्ण विस्तृत वर्णन किया । गुरुदेव ने अनेक नीतियाँ भी बतायी जीव के कर्म प्रतिकूल या अनुकूल रहने पर ही अन्य सुख दुःख देते है।

 

 

उपकार का स्मरण करने वाला यश को प्राप्त होता है।महापुरुषों के चित्त की शान्ति प्रणाम मात्र से हो जाती है किन्तु दुर्जनों के चित्त की शांति महादानों से भी नहीं होती है,।निर्मल चित्त के धारक मनुष्य का प्रत्येक कार्य भगवान के वचनानुसार होता हैअपनी योग्यता के अनुसार सदैव प्रशस्त पुण्य करना ही चाहिए, क्योंकि पुण्य से सौभाग्य का निर्माण होता है । राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी में आगे बताया कि आज की। श्री राम कथा में राजेन्द्र पापड़ीवाल, भागचंद लुहाड़िया, पारस पोरवाल, विनोद बज,सन्मति पाटनी,योगेश मित्तल,पंडित जगदीश जी जैन,ललित लुहाड़िया,चेतन प्रकाश जैन, हेमन्त निखी॔ आदि उपस्थित थे।
प्रस्तुति
राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी
पारस जैन “पार्श्वमणि” पत्रकार
कोटा
9414764980

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