संसार शरीर और भोगों से जब विरक्ति हो जाती है,तो धन संपत्ति और पद से मोह समाप्त हो जाता है “संभवसागर महाराज
विदिशा
संसार शरीर और भोगों से जब विरक्ति हो जाती है,तो धन संपत्ति और पद से मोह समाप्त हो जाता है ” उपरोक्त उदगार मुनि श्री संभवसागर महाराज ने “जैनत्व का इतिहास” को बताते हुये व्यक्त किये उन्होंने भारत के सम्राट चंद्रगुप्त के वैराग्य का कथन करते हुये कहा जिनके अधीनस्थ कई राजा थे,जिनका वैभव संपूर्ण भारत पर था जब उनको संसार शरीर और भोगों के प्रति अरुचि हुई तो उन्होंने अंतरात्मा की यात्रा करने के लिये दक्षिण भारत के श्रवण बेलगोला में पहुंचे और सर्वश्रेष्ठ आचार्य भद्रवाहु स्वामी के चरणों में समर्पण किया तथा दिगंवर मुनि के रुप में दीक्षा धारण की।
मुनि श्री ने कहा कि संसार शरीर और भोगों से जब तक विरक्ति नहीं होगी तब तक आप अंतर्यात्रा नहीं कर सकते उन्होंने कहा कि हर व्यक्ती को यह भावना तो धारण करना ही चाहिये जिससे कर्मो की गांठ कम से कम कुछ तो ढीली हो जाय और यह अविनाशी पद प्राप्त हो जाये, मुनि श्री ने कहा कि आप कितनी भी इच्छाऐं कर लो इच्छाओं की पूर्ति कभी नहीं सकती लेकिन उन इच्छाओं पर थोड़ा विराम तो लगाया जा सकता है मुनि श्री ने कहा भले ही आप मुनि आर्यिका बनो या न बनो लेकिन भावना तो कर ही सकते है आज भावना करोगे तो धीरे धीरे इच्छाओं पर रोक लगेगी और कम से कम वृति श्रावक या श्राविका तो बन ही जाओगे जब हम इस भव में वृतिश्रावक बनेंगे तभी हम अगली पर्याय में मुनि या आर्यिका पद को धारण कर अपना उद्धार कर सकते है।


उन्होंने एक सुक्ती कही कि जो कर्म में सूर है वही धर्म में सूर है। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया प्रातः प्रवचन के पूर्व जैन मिलन महिला मंडल की सदस्याओं ने आचार्य गुरुदेव एवं मुनि श्री की अष्टदृव्यों से पूजन की प्रवचन के उपरांत मुनि श्री निस्सीम सागर महाराज ने प्रश्नमंच के माध्यम से प्रश्न पूंछे सही जबाब देने वालों को पुरस्कार प्रदान किया गया।



इस अवसर पर, मंदिर टृस्ट अध्यक्ष संजय सेठ, महेन्द्र बंट, शीतलधाम अध्यक्ष सचिन जैन, सकल दि. जैन समाज अध्यक्ष शैलेन्द्र चौधरी,प्रवक्ता अविनाश जैन, अनिरुद्ध सराफ ,अशोक अरिहंत उपस्थित थे।मुकेश जैन बड़ाघर ने संचालन किया।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

