इतिहास तोड़ने वालों को नहीं जोड़ने वालों को याद रखता है”- मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज

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इतिहास तोड़ने वालों को नहीं जोड़ने वालों को याद रखता है”- मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज

भोपाल (अवधपुरी)

प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया जैन धर्म संघ पुणे से बड़ी संख्या में युवक एवं युवतियां पधारी एवंशंकासमाधान प्रणेता मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज से अपनी शंकाओं का समाधान किया मुनि श्री से जैन धर्म का इतिहास तथा जैन धर्म का विखंडन का प्रश्न रखा जिनका सटीक उत्तर देते हुये मुनि श्री ने कहा”संकीर्ण मानसिकता और नकारात्मक सोच जैन धर्म की प्रगति में पहले भी बाधक थी, और आज भी है, यदि हम सकारात्मक सोच और सावधानी के साथ आगे बढ़ेंगे तो हम हो रहे विखंडन को रोक सकते है,कदाचित हम यदि बिखराव को रोकने में सफल न भी हो पाये तो इतिहास हमें तोड़ने वालो में नहीं जोड़ने वालों में याद रखेगा।

 

 

 

 

उन्होंने आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागरजी महामुनिराज का एक मंत्र “केंची नहीं सुई बनो” कविता को सुनाते हुये कहा कि कैची का काम सीधा काटना होता है, जब कि सुई का काम है सीना ओर जोड़ना,कैंची चलाना बहूत सरल है,जब कि सुई को चलाना थोड़ा कठिन है,  उसी प्रकार किसी को तोड़ना बहुत सहज है लेकिन जोड़ने में बहुत श्रम और पसीना बहाना पड़ता है, मुनि श्री ने कहा कि यदि हमारी सोच और दृष्टिकोण सकारात्मक साफ सुथरी हो तो हम समर्थ हो सकते है।

 

 

 

उन्होंने कहा कि नकारात्मक प्रवृत्तियो तथा नकारात्मक बातों से हमेशा सुरक्षित दूरी बनाकर रखोगे तो हमारा जीवन पूरी तरह सुरक्षित रहेगा।उन्होंने “जैन युवा संघ” के सभी कार्यकर्ताओं को आशीर्वाद देते हुये कहा कि जहा आज के इस दौर में जब युवा पीढ़ी मजा मौज मस्ती की ओर अग्रसर है,वहा यह जैन संघ पुणे के यह युवा अपने तन मन धन के साथ अपने आपको समर्पित करते हुये धर्मध्वजा को आगे ले जाते हुये दिखते है,तो मन में हार्दिक प्रसन्नता की अनुभूति होती है।

 

 

 

उन्होंने सभी युवाओं की प्रशंसा करते हुये कहा कि यह सभी स्वाध्यायी छात्र है तथा ओन लाईन जैन धर्म के तत्वज्ञान को आगे बढ़ा रहे है तथा “सराक” जन जाती जो कि उड़ीसा राज्य में बहुतायत संख्या में है उन पर शोध का विशेष कार्य कर रहे है , मुनि श्री ने उत्तर देते हुये कहा “उड़ीसा राज्य कला एवं स्थापत्य कला का बहुत बड़ा केंद्र रहा है, तथा वहा पर जैन संस्कृति पुरातन काल से ही स्थापित रही है, सम्राट खारवेल का कुमारीपर्वत पर अंकित शिलालेख एक पुष्ट दस्तावेज है,तथा उस राज्य से निकलने वाली जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ जो कि आठवीं शताब्दी की है वह इस बात का प्रमाण है कि वहा जैनधर्म राष्ट्र का प्रतीक था एवं वहा की बहुसंख्यक आबादी जैन धर्म का अनुपालन करती थी आप लोग जो शोध कर रहे हें उसके परिणाम निश्चित सकारात्मक मिलेंगे,

 

 

उन्होंने संबंधित एक और प्रश्न “जैन धर्म भारत तक ही सीमित क्यों अन्य देशों में क्यों नहीं? का उत्तर देते हुये कहा कि जैनधर्म के प्रवर्तक तीर्थंकर ऋषभदेव थे,

उस समय संपूर्ण आर्यावर्त क्षेत्र ही भारत था जिसका विस्तार बहुत बड़ा था और तीर्थंकर भगवान जहा तक विचरण कर सकते थे वह वहा तक गये,इसी कारण भारत के बाहर भी कही यूरोपीय देशों में तीर्थंकर भगवान के अवशेष देखने को मिलतेहै,उस काल में जैन धर्म फैला और आगे भी बड़ा तत्पश्चात साधुओं का आवागमन न होंने तथा वहा की जलवायु, शीत कटिबंध क्षेत्र एवं हिमाच्छादित इलाके जहा अहिंसावृत का पालन करना तथा उनकी निर्विवाद चर्या का पालन होंना कठिन था,जैन साधुओं का समुद्र मार्ग मैं यात्रा नहीं कर सकने के कारण भी वह एक सीमा से बाहर नहीं जा पाए फिर भी कुछ एशियाई देशों में ऐसे प्रमाण मिलते है जिसमें एक “माया संस्कृति” है जिसमें जैन अवशेष देखने को मिले है हालांकि वहा भी शोध चल रहा है,और ऐसा लगता है कि वहा पहले जैन कल्चर था और वहा विद्याधरों की भूमिका मिलती है, मुनि श्री ने कहा कि राजनीतिक परिस्थितियां भी जैन धर्म के विस्तार को रोकने में सहायक बनी एक समय था बहुसंख्यक आबादी जैन धर्म का पालन करती थी बाद में कुछ ऐसे राजनीतिक भूचाल आये जिससे जैन धर्म बुरी तरह प्रभावित हुआ तथा राजनीतिक संरक्षण के अभाव में जैन धर्म का ह्रास हुआ गुप्त वंश तथा कल्चुरी जैन राजाओं के काल तक जैन धर्म स्वर्णिम काल के रुप में रहा लेकिन मुगलों, शक्यों, तथा यमुनों के काल में जैन धर्म का बहुत बड़ा नुकसान हुआ, धार्मिक उन्माद और विद्वेष भी जैन धर्म के पतन का कारण बना।

 

 

मुनि श्री ने कहा जैन धर्म का उद्देश्य शांति को प्राप्त करना है और वर्तमान में समूचे विश्व को शांति की आवश्यकता है हम तत्वज्ञान के माध्यम से अपना उत्कृष्ट योगदान देकर विश्व में अशांति को दूर करने में सहायक हो सकते है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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