बिना संघर्ष के जीवन का उत्कर्ष नहीं हो सकता”- मुनि श्री प्रमाण सागर

धर्म

“बिना संघर्ष के जीवन का उत्कर्ष नहीं हो सकता”- मुनि श्री प्रमाण सागर

   भोपाल 

“आलस को त्याग कर अपने अंदर के पुरुषार्थ को जगाओ” “अकर्मण्य नही,कर्मयोगी बनो”उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने अवधपुरी भोपाल में प्रातःप्रवचन सभा में व्यक्त किये,उन्होंने कहा कि अकर्मण्य व्यक्ति अपनी आत्मा का तिरस्कार तो करता ही है, साथ ही वह समय को भी नष्ट कर रहा है, योग्य समय का उपयोग नहीं करना ही “अकर्मण्य” या आलसी कहलाता है” 

 

 

 

 

उन्होंने कहा “जो नदी प्रवाह के साथ आगे बढ़ती है,वहअपने लक्ष्य को प्राप्त कर सागर में जा मिलती है,एवं जो इधर उधर भटकती है,वह अपने प्रवाह को खोकर पोखर में परिवर्तित हो नष्ट हो जाती है,ठीक उसी प्रकार हमारा जीवन है,जो अपने लक्ष्य की ओर आगे बड़ते है,वह अपनी योग्यता से विराट स्वरूप को पा लेते है, तथा दूसरी ओर जो इधर उधर की बातों में ध्यान देकर अपना समय नष्ट कर देते है,वह अपने जीवन से दिग्भ्रमित होकर,लक्ष्य की ओर न पहुंच कर अपने जीवन को छुद्र बना लेते है, “दुनिया में जितने भी सफलतम लोग हुये है, उनके जीवन में झांककर देखोगे तो एक ही बात सामने आयेगी उन्होंने अपने काम को प्रमुखता दी,जब व्यक्ती के ऊपर शारिरिक आलस के साथ साथ मानसिक निष्क्रियता हावी हो जाती है,तो व्यक्ति जो है उसे ही स्वीकार कर अकर्मण्यहो, निठल्ला बैठ जाता है।

 

 

 

मुनि श्री ने कहा कि “जीवन में कुछ करके आगे बढ़ना चाहते हो तो सतत उत्साहित रहो तथा अपने अंदर की क्षमता तथा अपनी योग्यता को पहचान कर उसका भरपूर उपयोग करो एवं अपने लक्ष्य को हासिल करो,मुनि श्री ने कहा कि जिन बच्चों का ध्येय अच्छे नंबरों से पास होंना है वह न केवल अच्छे ढंग से पड़ते है,बल्कि जीवन में कुछ अच्छा अचीवमेंट भी हासिल करते है,उन्होंने “सभी बच्चों से कहा कि अपने अंदर यह विश्वास जगाओ कि “हम जो चाहते है वही हासिल कर के रहेंगे”

 

 

 

 

मुनि श्री ने कहा कि जो लोग यह सोचते है,कि जो होगा वह देखा 

जाएगा तो समझना वह दुनिया का सबसे बड़ा आलसी और अकर्मण्य

व्यक्ती है” अपने अंदर के आलस को त्याग कर अपने अंदर का पुरुषार्थ जगाओ” ध्यान रखना “निज का कर्ता में स्वंय हूं” दूसरा व्यक्ति मात्र निमित्त हो सकता है, उन्होंने अपना उदाहरण देते हुये कहा कि मेरे यहा तक पहुंचने में निश्चित करके आचार्य गुरुदेव मेरे निमित्त बने है, लेकिन उद्यम तो मुझे ही करना पड़ा, उन्होंने कहा कि “अकर्मण्यता जब हावी हो जाती है तो व्यक्ती अच्छे अवसरों का उपयोग नहीं कर पाता,वह जहा है वही का वही रह जाता है, जबकि कर्मठता के बल पर वह साधारण जीवन को भी असाधारण बनाकर उच्च स्थान को पा जाता है,

 

 

 

 

आचार्य गुरुदेव हमेशा कहा करते थे “बिना संघर्ष के जीवन का उत्कर्ष नहीं हो सकता”

इसलिये सही समझ के साथ अपने जीवन को आगे बढ़ाईये तथा अपने आपको क्रियाशील तथा उद्यमी बनाएंगे तो देखना आपके जीवन में आनंद छा जाएगा।

 

 

 

 उपरोक्त जानकारी प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने देते हुये बताया प्रतिदिन प्रातः 8:30 बजे से प्रवचन तथा सांयकालीन6ः20 से शंकासमाधान कार्यक्रम प्रतिदिन संपन्न हो रहा है।

        संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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