वर्तमान समय में व्यक्ति जिनवाणी का स्वाध्याय कम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया पर दिखाए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों को ज्यादा देखता है जिससे उसे पुण्य अर्जन तो हो सकता है पर कल्याण नहीं समय सागर महाराज

धर्म

वर्तमान समय में व्यक्ति जिनवाणी का स्वाध्याय कम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया पर दिखाए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों को ज्यादा देखता है जिससे उसे पुण्य अर्जन तो हो सकता है पर कल्याण नहीं समय सागर महाराज
खुरई
परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज के प्रथम दीक्षित शिष्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 समय सागर महाराज सानिध्य में वीरशासन जयंती पर्व मनाया गया।

 

पूज्य आचार्य श्री ने वीर शासन जयंती का महत्व बताते हुए अपने उद्बोधन में कहा कि सालों पहले आज की पावन तिथि पर तीर्थंकर भगवान की वाणी खिरी थी। और उन्हीं से ज्ञान को ग्रहण कर उनकी दिव्य देशना सुनकर गणधर स्वामी ने लिपिबद्ध किया था।

इस कारण यह महापर्व जैन धर्म के लिए अति पवित्र एवं महान दिवस है। प्राचीन दिगंबर जैन मंदिर में पूज्य मुनि श्री ने वर्तमान की प्रासंगिकता पर कटाक्ष करते हुए कहा कि आज की वर्तमान में व्यक्ति जिनवाणी के स्वाध्याय को कम करता है एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया पर धार्मिक अनुष्ठानों को ज्यादा देखता है। जिससे उसे पुण्य अर्जन तो होता है। परन्तु कल्याण नही। उन्होंने यह भी कहा कि जरूरी नहीं है कि धाराप्रवाह प्रवचन करने वाले की या हजारों लाखों की भीड़ में ही धर्म की प्रभावना होती है। मौन साधक की यदि चर्या उत्कृष्ट हो तो उसके दर्शन वंदन करने मात्र से अनंतानंत कर्मों की निर्जरा होती है। वैसे भी कहा गया है कि भीड़ में धर्म नहीं होता है।

आगे बोलते हुए मुनि श्री ने कहा कि संसारी प्राणी को विशुद्धि बढ़ाने के लिए सतत स्वाध्याय करते रहना चाहिए। आपका चिंतन एवं श्रद्धान मजबूत होगा तो मंजिल अवश्य मिलेगी। वीर शासन जयंती आत्मानुशासन का पर्व है। हमें आचार्यों ने विभिन्न मूल ग्रंथो के माध्यम से ज्ञान का भंडार दिया है। आत्म कल्याण एवं जीवन मरण से मुक्ति का मार्ग बताया है। लेकिन हम बाहरी आडंबर प्रदर्शनों में ही उलझ कर रह गए हैं। हमारा व्यवहार भी नेताओं जैसा बनता जा रहा है जिसकी कथनी और करनी में एकरूपता बहुत कम देखी जाती है। ऐसा बैठकर शराब आदि का पिलाकर वोट तो खरीदा जा सकता है लेकिन मोक्ष मार्ग में यह सब संभव नहीं है। वर्तमान समय में देखने मैं आता है कि व्यक्ति समझता तो बहुत कम है, कांति दूसरों को ज्ञान बांटने में कोई कोताही नहीं बरतता। प्रत्येक व्यक्ति को अपने आप को बहुत ज्ञानी ध्यानी समझता है। ऐसा करना ठीक नहीं है। आपकी आस्था मजबूत होगी तो कालांतर में एक ना एक दिन आपका मोक्ष मार्ग प्रशस्त हो जाएगा। शरीर के प्रति तीव्र राग कारण ही तो मनुष्य शारीरिक स्वस्थता पाने के लिए अपने पसीने की कमाई को पानी की तरह आने के लिए तैयार हो जाता है। तो 100,50 रुपया का कभी दान नहीं करने वाला व्यक्ति किसी भी गंभीर बीमारी के ऑपरेशन के पीछे एक साथ लाखों रुपए खर्च करने के लिए तैयार हो जाता है। लोगों को मिटाने के लिए अताब शरीर को स्वस्थ रखने के लिए हम सब कुछ करने के लिए तैयार हो जाते हैं परंतु दान धर्म के लिए नहीं।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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