वैराग्य के लिए मरघट किसी मंदिर से कम नहीं आचार्य श्री प्रसन्न सागर महाराज
दिल्ली
अन्तर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय पियूष सागरजी महाराज ससंघ तरुणसागरम तीर्थ पर वर्षायोग हेतु विराजमान हैं उनके सानिध्य में वहां विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम संपन्न हो रहें हैं उसी श्रुंखला में उपस्थित गुरु भक्तों को अपने मौन संदेश में उपस्थित गुरु भक्तों को कहा कि दो गज सही, ये मेरी मिल्कियत तो है.. ऐ मौत तूने मुझे जमींदार बना दिया..!
मरघट को वैराग्य तीर्थ भी कह सकते हैं। वैराग्य के लिए मरघट किसी मंदिर से कम नहीं है। वैराग्य पाना है तो मरघट मंदिर की तरह है। यदि कोई व्यक्ति 3 दिन तक मरघट में रह जाए, तो फिर वह वहाँ से घर आने की अपेक्षा वन की तरफ प्रस्थान कर जाएगा।
उन्होंने कहा जीवन और जगत की असलियत का पता घर और बाजार में नहीं, मरघट में चलता है। यदि किसी को अपनी संपत्ति और उपलब्धियों का अहंकार है तो ऐसे व्यक्ति को थोड़े दिन के लिए मुंबई, दिल्ली, कोलकाता जैसे बड़े शहरों में भेज दीजिए, वहाँ सब कुछ ठीक हो जाएगा। क्योंकि जब वह मुंबई, दिल्ली जैसे महानगरों में एक से बढ़कर एक धन कुबेरों को देखेगा, उनके सुविधा पूर्ण जीवन को देखेगा, वहाँ सुंदर-सुंदर चेहरों को देखेगा, तो उसे अपनी औकात का पता स्वतः चल जाएगा और जब वहाँ से लौटेगा तो एकदम विनम्र होकर लौटेगा।
उपलब्धियों का उत्सव जरूर मनाइए। मगर यह मत भूलिए कि जो मिला है, वह हमेशा के लिए नहीं मिला है।
आज है और कल ना भी रहे, यह भी संभव है…!!! नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
