जो एक-एक पल का जो सद्उपयोग करता है, उसका ही भाग्योदय हो सकता है। संभवसागर महाराज

धर्म

जो एक-एक पल का जो सद्उपयोग करता है, उसका ही भाग्योदय हो सकता है। संभवसागर महाराज

खुरई

पूज्य मुनि श्री संभवसागर महाराज के मुखारविंद स 60 दिवसीय मूकमाटी ग्रन्थ की वाचना हो रही है उन्होने इस बात पर जोर दिया की इस ग्रन्थ को समझने के लिए एकाग्रता का होना आवश्यक है साथ ही कहा जो भी  व्यक्ति सूर्योदय होने के पूर्व ही जाग जाता है एवं अपना हर कार्य समय से करता है एक-एक पल का जो सद्उपयोग करता है, उसका ही भाग्योदय हो सकता है।

पश्चिम संस्कृति भारतीय संस्कृति के विपरीत है

उन्होने आगे बोलते हुए कहा वर्तमान परिवेश में हम पश्चिम संस्कृति को अपनाने लगे है जो  भारतीय संस्कृति के बिल्कुल विपरीत है। पाश्चात्य संस्कृति तो भोग-विलास को प्राथमिकता देती है, इसके विपरीत हमारी भारतीय संस्कृति में योगवाद, धार्मिक संस्कारों पर विशेष जोर देती है। संयम मार्ग पर चलने को बल देते हुए मुनि श्री ने कहा हमको संयम के मार्ग पर चलकर व्यसनों से दूर होकर हमारे महापुरुषों के बताए मार्ग पर ही चलना होगा।  धर्म वह वाशिंग पाउडर है, जो आत्मा की मलिनता दूर करता है। जो लोग शरीर और आत्मा का भेद जान लेते हैं, वह आत्म-साधना के माध्यम से अपना आत्म-कल्याण करके जन्म और मृत्यु के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं। शरीर तो नश्वर है, लेकिन इस नश्वर में एक जिनेश्वर है, उसे पाना है, उस तक पहुंचना है, यही मनुष्य का ध्येय होना चाहिए।

धर्म की आंखों से ही परमात्मा के दर्शन सम्भव हैं।

मुनि श्री ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा की सतयुग सदा है, यदि हम निर्मल दृष्टि हो तो। कलयुग भी सदा है,  सतयुग आज भी है, लेकिन हमें नहीं दिखेगा, क्योंकि हमारी दृष्टि दूषित है। परमात्मा तो सिर्फ उन्हें ही दिखाई पड़ता है, जिनकी आंखें हैं। आंख भी श्रद्धा की, भक्ति की। इन चमड़े की आंखों से परमात्मा को नहीं देख सकते। धर्म की आंखों से ही परमात्मा के दर्शन सम्भव हैं। सच्चा धर्मात्मा अत्यन्त उदार हृदय होता है। सम्यक दृष्टि का मन विराट होता है। वह सीमित व संकुचित दायरों से ऊपर उठकर जगत के हित में कर्म करता है और जगत के समस्त जीवों के प्रति करूणा व मैत्री भाव रखता है।

संकलित अभिषेक जैन लूहाडीया रामगंजमंडी

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