अपने सुख के लिए किसी को कष्ट देना, अहित करना सबसे बड़ा पाप है स्वस्तिभूषण माताजी

धर्म

अपने सुख के लिए किसी को कष्ट देना, अहित करना सबसे बड़ा पाप है स्वस्तिभूषण माताजी
केशवरायपाटन
परम पूजनीय भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 स्वस्तिभूषण माताजी ने बुधवार की बेला में अपने मंगल प्रवचन में कहा कि अपने सुख के लिए किसी को कष्ट देना, अहित करना सबसे बड़ा पाप है। गृहस्थी जीवन में रहकर, धर्म के मार्ग पर चलना ही स्वर्ग हे।

 

 

 

 

पूज्य माताजी ने आगे कहा कि मोक्ष पाना चाहते हो व संसार की जन्म मरण से छुटकारा पाना चाहते हो तो वैराग्य आवश्यक है। बिना वैराग्य धारण किए मोक्ष संभव नहीं है।

 

 

 

 

उन्होंने कहा कि वेदना अर्थ है कष्ट, पीडा दुख। जब तक वेदना होती है तो मनुष्य दीक्षा नहीं लेता है। वह गृहस्थी का मार्ग अपनाता है। श्रावक का मार्ग अपनाता है। इसका मतलब यह है नहीं कि वह धर्मात्मा नहीं है। मनुष्य गृहस्थ जीवन में रहकर धर्मात्मा हो सकता है।
गृहस्थी में रहकर पांचों इंद्रियों के सुख का अनुभव व धर्म भी करता है।

उन्होंने आगे कहा कि धर्म दो प्रकार के होते हैं गृहस्थ धर्म व मुनि धर्म जीवन में मुनि धर्म का पालन नहीं करते तो गृहस्थ धर्म का पालन जरूर करना चाहिए। घर में रहकर इन्द्रियों के सुख भोगते हुए भी धर्म का पालन किया जा सकता है। इंद्रियों की इच्छा पूर्ति में पाप लगता है, लेकिन अनंतानुबंधी नही लगता है जो सबसे खतरनाक है। इंद्रियों की इच्छा पूर्ति के लिए मनुष्य को हिंसा, झूठ बोलना, चोरी, परिगृह तक करना पड़ता है। क्रोध,मोह, माया, लोभ,राग, द्वेष करना पड़ता है। इंद्रियों की इच्छाओं की पूर्ति ऐसे ही संभव नहीं है। इसके लिए तो पाप में तो डूबना ही पड़ता है, लेकिन अच्छी बात यह है कि आप दूसरे का बुरा नहीं कर रहे हो। स्त्री हो या पुरुष अच्छा क्यों दिखना चाहते हैं, ताकि लोग उनकी और आकर्षित हो। ये वेद की वेदना ही तो है। क्योकि आप वेद की वेदना का त्याग नहीं कर पा रहे हो तो इसके लिए ही विवाह व्यवस्था बनी है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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