जो दिख रहा है वह सत्य नहीं,जो देख रहा है वह सत्य है* -मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज 

धर्म

जो दिख रहा है वह सत्य नहीं,जो देख रहा है वह सत्य है* -मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज 

विदिशा “मनुष्य के जीवन का यही सबसे बड़ा सत्य है कि वह जिंदगी भर असत्य के साथ जीता है,तथा पूरी उम्र इसी में खपा देता है”किसके साथ राग कर रहे? और किसके साथ द्वैष?हम भोगों के पीछे भागते है,और भोक्ता की उपेक्षा करते है? संत कहते है कि दृश्य की नहीं दृष्टा की तरफ देखो, भोग की तरफ नहीं भोक्ता की तरफ देखो शव्द की तरफ नहीं श्रोता की ओर देखो,अनुभव को नहीं अनुभोक्ता को पकड़ो वही सत्य है जो दिख रहा है वह सब असत्य है जो देख रहा है वही सत्य है” मुनि श्री ने चारबातें-जानो,मानो,ध्याओ, पाओ उन्होंने कहा कि सत्य कथ्य नहीं अकथ्य है,शव्दों के माध्यम से “सत्याचरण” की बात तो हो सकती है,लेकिन सत्य नहीं,

 

 

“सत्य”अनुभूति का विषय है यह एक साधना है! आप लोग जो सत्य बोलते हो “राम नाम सत्य है,अरिहंत नाम सत्य है” यह किसे सुना रहे हो? खुद को या उस मुर्दे को? उन्होंने मिश्रीलाल जैन की लिखी कविता” *अरिहंत नाम सत्य है सिद्धनाम सत्य है”* को सुनाते हुये कहा “पीछे पीछे दूर तक दिख रही जो भीड़ है,पंछी शाख से उड़ा खाली पड़ा नीड़ है,सृष्टि सारी देख ले पर्याय ही अनित्य है,सिद्ध नाम सत्य है अरिहंत नाम सत्य है,जिनको मेरे सुख दुखों से कुछ नहीं था वास्ता,उनके कांधों पे मेरा कट रहा है रास्ता,आंख जब मुंदी तो बोलो? न शत्रु है न मित्र है,

सिद्ध नाम सत्य है अरिहंत नाम सत्य है,डोरियों से मैं बंधा ,नहीं ये मेरा संस्कार था,एक कफन पर ही बस मेरा अधिकार था, तुम उसे उतारने जा रहे यह सत्य है…. आपके अनुराग को आज ये क्या हो गया,

मैं चिता पर चढ़ा महान कैसे हो गया,सत्य देख हंस रहा कि जल रहा असत्य है,सिद्ध नाम सत्य है अरिहंत नाम सत्य है” को सुनाते हुये कहा कि हम सत्य की बातें तो बहूत करते है लेकिन अंतिम समय तक असत्य के व्यामोह में उलझे रहते है,जब कि सत्य यही है “जिसने जन्म लिया है,उसकी मृत्यु निश्चित है”न कुछ लेकर आऐ न कुछ लेकर जाऐंगे”जैसा करेंगे वैसा भरेंगे”

“मेरा केवल मैं हुं बाकी सभी संबंध संयोग है” मुनिश्री ने कहा कि यह बात को जानते सब है,बचपन से ही तो पढ़ते चले आ रहे है,”राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असवार’ मरना सबको एक दिन अपनी अपनी बार *””आप अकेला अव तरे, मरे अकेला होय, क्या कहुं इस जीव को साथी सगा न कोय* ” जब तक हम इस सच्चाई कोअंतर्मन से स्वीकार नहीं करते तब तक जीवन की दिशाऔर दशा नहीं बदल सकते?

भगवान बुद्ध ने तो एक रोगी और एक मृतक को ही देखा और जीवन के सत्य को जान गये और वह बुद्ध हो गये आप लोग तो न *जाने कितनी बार हास्पिटल और श्मशान के चक्कर लगा आऐ बाल पक गये कमर झुक गयी फिर भी जीवन का व्यामोह नहीं छूंटा?* उन्होंने कहा यही जीवन का परम सत्य है और सत्य ही बोधी का आधार है कि में एक शुद्ध ज्ञान, दर्शन मयी अदृश्य,अरुपी आत्मा हुं मुझसे भिन्न एक परमाणु भी मेरा नहीं, जिंदगी भर असत्य को ही सत्य मानकर जीते है। *”हाथ में “अंगार” लिये हम पूंछते है दूसरों से, बता इसकी तासीर क्या है?*

 मुनि श्री ने कहा कि भोग विलास राग रंग में उलझे रहोगे तब तक तुम्हारी दिशा और दशा नहीं बदल सकती सत्य को पहचान लोगे उसी समय से दिशा और दशा बदल जायेगी, जो व्यक्ति आत्मा के स्वभाव को जान लेता है,तो उसकी प्रवत्ती में सरलता,परिणामों में निर्मलता, भावों में उज्जवलता, तथा व्यवहार में शालीनता आ जाती है।

उपरोक्त जानकारी देते हुये प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया मंगलवार को “उत्तम संयम” तथा3 सितंवर बुद्धवार को उत्तम त्याग के दिन धूप दशमी पर मुनि श्री के मुखारविंद से विशेष प्रवचन एवं “गुणायतन” के संद्रभ में विशेष जानकारी दी जाऐगी प्रतिदिन शिवारार्थिओं के द्वारा सांयकालीन शंकासमाधान में समस्त शंकाओं का समाधान किया जा रहा है।

   संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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